मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

“पंचायतन”

हमारे शास्त्रों में “पंचायतन” पूजा को बहुत महत्व दिया गया है। “पंचायतन” का अर्थ होता है- पंच देवों की पूजा ये पांच देव है- सूर्य,गणेश,विष्णु,शिव व शक्ति (दुर्गा)। “पंचायतन” के भी पांच प्रकार होते हैं जैसे शिव पंचायतन, विष्णु पंचायतन जिसमें इन पंच देवों एक विशेष प्रकार से स्थापित किया जाता है। इन पंच देवों का पूजन किस प्रकार किया जाता है इसके तो कई विधान है जैसे पंचोपचार-षोडषोपचार आदि किंतु इन्हें सबसे प्रिय क्या है;यह मैं आपके लिए यहां स्पष्ट कर रहा हूं, जैसे गणेश जी को तर्पण सर्वाधिक प्रिय है, भगवान सूर्य को अर्घ्य, शिव को अभिषेक, शक्ति को अर्चन एवं विष्णु को स्तुति सबसे अधिक प्रिय है।


वैदिक अनुष्ठान करवाएं

“ज्योतिर्विद” पं. हेमन्त रिछारिया

वैदिक अनुष्ठान करवाने के लिए संपर्क करें-


मित्रों, यदि आप अपनी वर्षगांठ, पुत्र-पुत्री के जन्मोत्सव, विवाह वर्षगांठ, पुण्यस्मरण, आदि के अवसर पर वैदिक ब्राह्मणों द्वारा विशेष वैदिक अनुष्ठान संपन्न करवाना चाहते हैं या ज्योतिष शिविर एवं आध्यात्मिक परिचर्चा आयोजित करवाना चाहते हैं तो “प्रारब्ध ज्योतिष संस्थान” के कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं। हमारे यहां उच्च प्रशिक्षित श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा निम्न वैदिक अनुष्ठान संपन्न करवाए जाते हैं।

अनुष्ठान का नाम-
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१. राजराजेश्वरी मां ललिताम्बिका सहस्त्रार्चन अनुष्ठान
२. संगीतमय रुद्राभिषेक एवं महाआरती
३. संगीतमय सहस्त्रधारा रुद्राभिषेक
४. संगीतमय द्वादश ज्योर्तिलिंग रुद्राभिषेक
५. सवालक्ष पार्थिव शिवलिंग निर्माण एवं रुद्राभिषेक
६. मां बगलामुखी अनुष्ठान
७. महाआरती
८. दीपार्चन
९. गौ पूजा
१०.महामृत्युंजय अनुष्ठान
११. नवग्रह शांति

हमारा पता है- प्रारब्ध ज्योतिष संस्थान
“ज्योतिर्विद” हेमन्त रिछारिया, 
 हमारा ई-मेल पता है-astropoint_hbd@yahoo.com

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

“खाली दिमाग; भगवान का घर”-

एक पुरानी कहावत है -“खाली दिमाग शैतान का घर”। यह बात ही गलत है। मेरे देखे “खाली दिमाग तो भगवान का घर” होता है, बशर्ते वह पूर्णरूपेण खाली हो और खाली होने की तरकीब है “ध्यान”। अक्सर लोगों के ध्यान के बारे अनेक प्रश्न होते हैं कि ध्यान क्या है; कैसे किया जाता है आदि-आदि। इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है-खाली होना। दिल से; दिमाग; विचार से सब ओर से पूर्णरूपेण हो जाना; रिक्तता। जब आप अपने इस पंचमहाभूतों से निर्मित नश्वर शरीर रूपी पात्र को खाली कर लेते हैं तब इस पात्र में परमात्मा रूपी अमृत के भरे होने की अनुभूति होती है। इस अनुभूति विद्वतजन विलग-विलग नामों से पुकरते हैं कोई ईश्वरानुभूति कहता है, कोई ब्रह्मसाक्षात्कार, कोई तत्व-दर्शन, कोई मोक्ष, कोई निर्वाण, कोई कैवल्य ये सब नामों के भेद हैं आप चाहें तो कोई नया नाम भी दे सकते हैं किंतु जो अनुभूत होता है वह निश्चय ही शब्दातीत है; अवर्णनीय है। ऐसी दिव्य अनुभूति इस जगत में सभी को हो ऐसी उस अंतर में विराजमान प्रभु से प्रार्थना है।

रविवार, 9 नवंबर 2014

अभिमान और स्वाभिमान

अक्सर अभिमान और स्वाभिमान में अंतर को लेकर चर्चाएं सुनने को मिलती हैं। मेरे देखे अभिमान (अहंकार) और स्वाभिमान में बड़ा ही सूक्ष्म अंतर है। जब अभिमान का भाव स्वयं के प्रति होता है यह अंहकार कहलाता है और जब यह भाव समष्टि के प्रति होता है तब स्वाभिमान बन जाता है। कोई भी भाव जिसके केन्द्र में “मैं” और “मेरा” है वह अहंकार के अतिरिक्त कुछ और हो ही नहीं सकता, चाहे यह भाव परमात्मा के प्रति ही क्यों ना हो। मूल रूप से “मैं” का भाव ही अहंकार की जड़ है। अहंकार के रास्ते बड़े सूक्ष्म होते हैं कभी यह त्याग के रास्ते आता है, कभी विनम्रता के, कभी भक्ति के, तो कभी स्वाभिमान के, इसकी पहचान करने का एक ही तरीका है जहां भी “मैं” का भाव उठे वहां अहंकार जानना चाहिए इसीलिए हमारे शास्त्रों मे “मैं” भाव के त्याग पर इतना बल दिया है। मेवलाना जलालुद्दीन रूमी की कविता में प्रेमिका अपने “मैं” भाव वाले प्रेमी को वापस लौटा देती है, द्वार नहीं खोलती जब तक कि वह “तू” नहीं बोलता। किसी संत ने क्या खूब कहा है-
                    “तूं तूं करता तू भया, मुझमें रही ना हूं
                     वारी तेरे नाम की, जित देखूं तित तूं”।
इस संसार में एक ही है उसे चाहे जो कह लें “परमात्मा” “अल्लाह” “अस्तित्व” “शून्य” “मोक्ष” सिर्फ़ नामों का भेद है। हिंदू धर्म में “अद्वैत” दर्शन मिलता है। “अद्वैत” बड़ा बहुमूल्य शब्द है जिसका अर्थ होता है-“दो नहीं” क्योंकि “एक” कहने के लिए भी “दो” का होना ज़रूरी है, नहीं तो “एक” थोथा होगा। जिस प्रकार जहां केवल सत्य बोलने की ही स्वतंत्रता हो वहां सत्य का क्या मूल्य,  तो मनीषियों ने कहा “दो नहीं” अर्थात “अद्वैत”। हमें इतनी गहराई में जाने की आवश्यकता नहीं बस “मैं”  की पहचान और विसर्जन करते जाएं, अहंकार से मुक्त होते  जाएं।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

चार पुरुषार्थ

धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष हिंदू धर्म के चार पुरुषार्थ हैं। मेरे देखे इनका क्रम बड़ा महत्वपूर्ण है। “अर्थ और काम” ये दो ऐसे तत्व है जो मनुष्य आसानी से भटका सकते हैं इसीलिए इन पर “धर्म और मोक्ष” नामक दो पहरे बिठा दिए। इसका आशय है कि मनुष्य अर्थोपार्जन करे लेकिन धार्मिक रीति से और कामोपभोग करे लेकिन मोक्ष की मर्यादा में। इस प्रकार के बहुमूल्य सूत्रों के कारण हमारे सनातन धर्म की श्रेष्ठता है।

रविवार, 2 नवंबर 2014

प्राण-प्रतिष्ठा का अर्थ-

पंडितजन कहते हैं कि हम भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा कर रहे हैं। भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा..! आश्चर्य की बात है। जो परमात्मा इस जगत के समस्त प्राणियों में प्राणों का संचार करता है हम उस परमात्मा में प्राणों की प्रतिष्ठा कर रहे हैं। कैसी मूढ़तापूर्ण बात है। मेरे देखे यदि शास्त्र गलत हाथों में पड़ जाए तो वह शस्त्र से भी ज़्यादा खतरनाक हो जाता है। यदि नर, नारायण के प्राणों की प्रतिष्ठा करने में सक्षम हो जाए तो वह नारायण से भी बड़ा हो जाएगा क्योंकि जन्म देने वाला सदा ही जातक से बड़ा होता है। इसीलिए नारायण की नर लीलाओं में नारायण को जन्म देने वाले माता-पिता के आगे स्वयं नारायण झुके हैं। ये बड़ी गहरी बात है। शास्त्रों में किसी पाषाण प्रतिमा या पार्थिव की प्राण प्रतिष्ठा करना बहुत सांकेतिक है। यहां प्राण प्रतिष्ठा से आशय केवल इतना ही है कि हमें एक ना एक दिन अपनी इस पंचमहाभूतों से बनी देह-प्रतिमा में परमात्मा; जो कि पहले से ही इसमें उपस्थित है, उसका साक्षात्कार कर उसे इस देह में प्रतिष्ठित करना है; प्रकट करना है। मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्टा का उपक्रम करना इसी बात का स्मरण मात्र है इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

"सांसों की माला सर्वश्रेष्ठ"

“अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि भगवन्नाम स्मरण के लिए सबसे अच्छी माला कौन सी है, तुलसी की; रुद्राक्ष की या स्फ़टिक की? मैं उनसे कहता हूं- सांसों की क्योंकि जब प्रेमी को याद करना होता है तो सांसों की माला से बेहतर और कोई माला हो ही नहीं सकती और परमात्मा से बढ़कर हमारा कोई दूसरा प्रेमी नहीं है तभी तो सूफ़ी गाते हैं “सांसो की माला पे सुमिरुं मैं पी का नाम...।”

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

"नियम नहीं भाव दृढ़ हो"

“परमात्मा नियम से नहीं बल्कि भाव से मिलता है। परमात्म-तत्व की अनूभूति के लिए भाव का दृढ़ होना आवश्यक है; नियम का नहीं। यह बात अलग है कि जब भाव पक्का हो जाता है तब सभी कुछ नियम जैसा भासता है।”

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

"धर्म एक व्यवस्था है"

“मेरे देखे धर्म एक व्यवस्था मात्र है। जो भी व्यवस्था बनाने में सहयोग करता है वह धार्मिक है और जो व्यवस्था बिगाड़ता है वह अधार्मिक है। जब जीवन में परमात्मा का प्राकट्य होता है तब सभी कुछ व्यवस्थित हो जाता है।”

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

“सबमें रब दिखता है...”

आज एक गीत के बोल सुनाई पड़े “तुझमें रब दिखता है य़ारा मैं क्या करूं.” जी चाहा कि इस गीतकार से कहूं कि अब कुछ ऐसा करो कि सबमें रब दिखने लगे। जब किसी एक में रब दिखे तो सांसारिक प्रेम, जब सबमें रब दिखने लगे तो भक्ति। हम प्रेम का प्रारंभ भले ही इस गीत के मुखड़े की तरह करें किंतु उसका पराकाष्ठा “सबमें सब दिखता है...” के रूप में ही करें। जब प्रेम इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है तभी वह भक्ति में परिणित हो जाता है और परमात्मा हमारा प्रेमी बन जाता है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

जानिए “गुरू-पुष्य” के बारे में-


सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक है जैसा कि अक्सर सुनने में आता है “गुरू-पुष्य नक्षत्र”; यह  अपने आप में एक गलत शब्द है। “गुरू-पुष्य” किसी नक्षत्र का नहीं अपितु एक मुर्हुत का नाम है, जो “पुष्य” नामक नक्षत्र के संयोग से बनता है। हमारा आकाश जिसे ज्योतिषीय भाषा में “भचक्र” कहते हैं; २७ बराबर भागों में विभक्त रहता है। यही विभक्त तारा पुंज “नक्षत्र” कहलाते हैं। प्रत्येक नक्षत्र का मान १३ अंश २० कला होता है। एक राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण ३ अंश २० कला का होता है। “पुष्य” सब नक्षत्रों का राजा माना जाता है। “पुष्य” नक्षत्र के स्वामी न्यायाधिपति “शनि” होते हैं। यह एक अत्यंत शुभ नक्षत्र होता है। इसमें जन्म लेने वाला व्यक्ति धनी,प्रतिष्ठित,विद्वान व सात्विक आचार-विचार वाला होता है। मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम का जन्म “पुष्य” नक्षत्र में ही हुआ था। एक नक्षत्र का कालचक्र २७ दिनों का होता है। जब यह नक्षत्र अपने कालचक्रानुसार क्रमशः रविवार व गुरूवार के दिन होता है तो इसे “रवि-पुष्य” व “गुरू-पुष्य” शुभ संयोग का नाम दिया जाता है। इसमें “रवि-पुष्य” साधना के लिए एवं “गुरू-पुष्य” खरीदी व किसी भी शुभ कार्य के शुभारंभ हेतु अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है।

संवत्सर

संवत् ५ प्रकार के होते हैं-
१.- संवत्सर- सूर्य के १२ राशियों के भोगकाल को “संवत्सर” कहा जाता है।
२.- परिवत्सर- गुरू के १२ राशियों के भोगकाल को “परिवत्सर” कहा जाता है।
३.- इडावत्सर- १२ मास के पूर्ण होने को “इडावत्सर” कहा जाता है।
४.- अनुवत्सर- चंद्रमा के १२ राशियों के भोगकाल को “अनुवत्सर” कहा जाता है।
५.- वत्सर- नक्षत्र घटित १२ मासों को “वत्सर” कहा जाता है।

मंगलवार, 7 अक्तूबर 2014

संस्कृत का पहला श्लोक


महर्षि वाल्मीकि के जीवन से जुड़ी एक घटना है। एक बार महर्षि वाल्मीकि एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे. वह जोड़ा प्रेम करने में लीन था. पक्षियों को देखकर महर्षि वाल्मीकि न केवल अत्यंत प्रसन्न हुए, बल्कि सृष्टि की इस अनुपम कृति की प्रशंसा भी की. इतने में एक पक्षी को एक बाण आ लगा, जिससे उसकी जीवन -लीला तुरंत समाप्त हो गई. यह देख मुनि अत्यंत क्रोधित हुए और शिकारी को संस्कृत में कुछ श्लोक कहा. मुनि द्वारा बोला गया यह श्लोक ही संस्कृत भाषा का पहला श्लोक माना जाता है.

“मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
 यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥”

(अरे बहेलिये, तूने काममोहित मैथुनरत क्रौंच पक्षी को मारा है. जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी)

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

साढ़े तीन मुहूर्त

"मुहूर्त्त" अर्थात् किसी भी कार्य को करने का श्रेष्ठतम समय। शास्त्रानुसार मास श्रेष्ठ होने पर वर्ष का, दिन श्रेष्ठ होने पर मास का, लग्न श्रेष्ठ होने पर दिन का एवं मुहूर्त्त श्रेष्ठ होने पर लग्न सहित समस्त दोष दूर हो जाते हैं। हमारे शास्त्रों में शुभ मुहूर्त्त का विशेष महत्त्व बताया गया है किन्तु कुछ ऐसी तिथियाँ होती हैं जब मुहूर्त्त देखने की कोई आवश्यकता नहीं रहती ऐसी तिथियों को “अबूझ मुहूर्त्त” या “स्वयं सिद्ध मुहूर्त्त” कहते हैं। ऐसे “स्वयं सिद्ध मुहूर्त्त” की संख्या हमारे शास्त्रों में साढ़े तीन बताई गई है। आईए जानते हैं “अबूझ मुहूर्त्त” कौन से होते हैं।
१. चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा अर्थात् गुड़ी पड़वा (हिन्दू नववर्ष)
२. विजयादशमी (दशहरा)
३. अक्षय तृतीया (अखातीज)
४. कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का आधा भाग
उपर्युक्त तिथियों को स्वयं सिद्ध मुहूर्त्त की मान्यता प्राप्त है। इन तिथियों में बिना मुहूर्त्त का विचार किए नवीन कार्य प्रारम्भ किए जा सकते हैं।

सोमवार, 29 सितंबर 2014

तैंतीस कोटि देवता

अक्सर लोग अपने अज्ञान के कारण कई गलत बातों को प्रचलन में डाल देते हैं जिसे बाद में गलत सिद्ध कर पान कठिन हो जाता है ऐसी ही मिथ्या धारणा है कि सनातन हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी-देवता हैं;लेकिन ऐसा है नहीं, सच्चाई इसके बिलकुल ही विपरीत है |  हमारे वेदों में 33 “कोटि” देवी-देवताओं का उल्लेख है | संस्कृत के “कोटि” शब्द का अर्थ “प्रकार” भी होता है और “करोड़” भी, किंतु कुछ धर्मावलंबियों ने इसका वास्तविक अर्थ समझे बिना ही इसे “करोड़” के रूप में प्रचारित कर दिया, यह एक ऐसी भूल है जिसने वेदों में लिखे पूरे अर्थ को ही परिवर्तित कर दिया |  हमारे धर्म ग्रंथों में सूर्य, चन्द्र, वरुण, वायु , अग्नि को भी देवता माना गया है। ज़रा विचार कीजिए यदि वास्तव में ३३ करोड़ देवी-देवता होते तो कहीं ना कहीं;किसी ना किसी शास्त्र में उनका नाम तो अवश्य होता! क्या आज तक किसी भी हिन्दू धर्मगुरू ने ३३ करोड़ देवी-देवताओं के नाम का उल्लेख किया है? इसके विपरीत ३३ प्रकार के देवताओं के नाम उपलब्ध हैं जो इस प्रकार हैं-

12 आदित्य है - धाता , मित् , अर्यमा , शक्र , वरुण , अंश , भग , विवस्वान , पूषा , सविता , त्वष्टा , एवं विष्णु |

8 वसु हैं - धर , ध्रुव ,सोम , अह , अनिल , अनल , प्रत्युष एवं प्रभाष

11 रूद्र हैं - हर , बहुरूप, त्र्यम्बक , अपराजिता , वृषाकपि , शम्भू , कपर्दी , रेवत , मृग्व्यध , शर्व तथा कपाली |

2 अश्विनी कुमार हैं |

कुल : 12 +8 +11 +2 =33

वैसे समाधि को उपलब्ध साधक ये भलीभांति जानते हैं कि शून्य और निराकार अस्तित्व के अतिरिक्त ईश्वर की और कोई सत्यता नहीं है इसके बारे में हमारे धार्मिक ग्रंथों ने भी बताया है जैसे  “निरंजनो निराकारो एको देवो महेश्वरः” अर्थात इस ब्रह्माण्ड में सिर्फ एक ही देव हैं जो निरंजन निराकार है वहीं रामायण में भी तुलसीदास जी ने कहा है “बिनु पद चले सुने बिनु काना, बिनु कर करम करे विधि नाना”। गुरूनानक देव  का वचन है-“एक ओंकार सतनाम”।

पंच;सप्त;अष्ट;दश

पंचामृत-

१. गौदुग्ध
२. गौघृत (गाय का घी)
३. दही (गाय के दूध से बना)
४. गंगोदक (गंगाजल)/नर्मदाजल
५. शहद

पंचगव्य-

१. गौमूत्र
२. गाय का गोबर
३. गौदुग्ध
४. गौघृत (गाय का घी)
५. दही (गाय के दूध से बना)

पंचरत्न-

१. स्वर्ण
२. चांदी
३. तांबा
४. मूंगा
५. मोती

पंचपल्लव-

१. पीपल का पत्ता
२. आम का पत्ता
३. गूलर का पत्ता
४. बड़ का पत्ता
५. अशोक का पत्ता

सप्तधान्य-

१. जौ
२. गेहूं
३. चावल
४. तिल
५. कंगनी
६. उड़द
७. मूंग

सप्तधातु-

१. स्वर्ण
२. चांदी
३. ताम्बा
४. लोहा
५. रांगा
६. सीसा
७. आरकुट

सप्तमृतिका

१. हाथी के पांव की
२. अस्तबल की
३. नदी संगम की
४. तालाब की
५. बामी की
६. दीमक की
७. राजद्वार या गौशाला की

अष्टमहादान-

१. कपास
२. नमक
३. घी
४. सप्तधान्य
५. स्वर्ण
६. लोहा
७. भूमि
८. गौदान

अष्टांगअर्घ्य-

१. जल
२. पुष्प
३. कुशा का अग्रभाग
४. दही
५. चावल
६. केशर
७. दूर्वा
८. सुपारी

दशमहादान-

१. गौ
२. भूमि
३. तिल
४. स्वर्ण
५. चांदी
६. वस्त्र
७. धान्य
८. गुड़
९. घी
१०. नमक

श्रावणी उपाकर्म एवं हेमाद्रि संकल्प

वर्ष भर हुए ज्ञात अज्ञात संपूर्ण पापों के लिए प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के अवसर पर “हेमाद्रि संकल्प” एवं “श्रावणी उपाकर्म” किया जाता है। विशेष रूप से यह दोनों कर्म ब्राह्मणों के लिए अनिवार्य होते हैं। इसके अंतर्गत दशविधि (१०प्रकार के स्नान) जिसमें-
१. भस्म स्नान
२. मृतिका स्नान,
३. गोमय (गाय का गोबर) स्नान
४. पंचगव्य स्नान
५. गोरज स्नान
६. धान्य स्नान
७. फल स्नान
८. सर्वोषधि स्नान (हल्दी इत्यादि)
९. कुशोदक स्नान (कुशा के जल से)
१०.हिरण्य (स्वर्ण)
आदि से स्नानोपरांत पितृ तर्पण व सप्तऋषियों का आवाहन व पूजन किया जाता है। इसके पश्चात नवीन जनेऊ (एकाधिक जनेऊ)  का शुद्धिकरण कर उनमें से एक को धारण किया जाता है। शास्त्रोक्त मत यह है कि वर्ष में कभी जनेऊ के अशुद्ध होने पर “श्रावणी उपाकर्म” के दौरान शुद्ध व अभिमंत्रित जनेऊ से ही पुराने-अशुद्ध जनेऊ का स्थानापन्न किया जाता है। यह कर्म ब्राह्मणों के लिए अनिवार्य बताया जाता है।

रविवार, 28 सितंबर 2014

सुभाषित


“भाग्योदये जन्तुं विशन्ति शतशः स्वयम्।
दिग्भ्योम्युपेत्य सर्वाभ्यः सायं तरूनिवाण्डजाः॥”

अर्थात् संध्या होते ही जैसे सभी पशु-पक्षी विभिन्न दिशाओं से आकर पेड़ पर रैन-बसेरा लेने पहुंच जाते हैं वैसे ही जब मनुष्य का भाग्योदय काल बनता है, तब सभी दिशाओं से विविध प्रकार की सम्पदा अनायास ही भाग्यशाली व्यक्ति के पास पहुंच जाती है।

भोजन विधान

सर्वप्रथम अपने दाहिनी ओर भूमि पर जल का सिंचन करें फिर निम्न मंत्र बोलकर उस भूमि पर तीन ग्रास  निकालें।
ॐ भूपतये स्वाहा
ॐ भुवनपतये स्वाहा
ॐ भूतानां पतये स्वाहा
तत्पश्चात भोजन मंत्र पढ़ने के उपरान्त निम्न मंत्र बोलकर आचमन करें-
“ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा”
फिर सर्वप्रथम छोटे-छोटे ५ ग्रास बनाकर निम्न मंत्रों के साथ (बिना बोले) ग्रहण करें-
ॐ प्राणाय स्वाहा
ॐ अपानाय स्वाहा
ॐ व्यानाय स्वाहा
ॐ उदानाय स्वाहा
ॐ समानाय स्वाहा

विभिन्न उपचार पूजन


पंचोपचार पूजन-

१. गन्ध
२. पुष्प
३. धूप
४. दीप
५. नैवेद्य

दशोपचार-

१. पाद्य
२. अर्घ्य
३. आचमन
४. स्नान
५. वस्त्र
६. गन्ध
७. पुष्प
८. धूप
९. दीप
१०. नैवेद्य

षोडशोपचार-

१. पाद्य
२. अर्घ्य
३. आचमन
४. स्नान
५. वस्त्र
६. आभूषण
७. गन्ध
८. पुष्प
९. धूप
१०. दीप
११. नैवेद्य
१२. आचमन
१३. ताम्बूल
१४. स्तवपाठ
१५. तर्पण
१६. नमस्कार

पंचदेव

गृहस्थ व्यक्ति के लिए शास्त्रों  में पंचदेवों की पूजा का विधान है-

“आदित्यं गणनाथं च देवीं रुद्रं च केशवम्।
 पंचदैवत्यमित्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत्॥”

ये पंचदेव हैं- सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु। इनकी पूजा सभी गृहस्थों को नियमित रूप से करनी चाहिए।

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

नवरात्र में दुर्गा साधना


प्रत्येक वर्ष अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शक्ति की आराधना का पर्व “नवरात्र” का प्रारंभ होता है, जिसे “शारदीय नवरात्र” कहते हैं। नवरात्रि में दुर्गा पूजा विशेष महत्व होता है। अनेक स्थानों पर पांडाल सजाकर देवी की प्रतिमा स्थापित कर देवी की पूजा-अर्चना की जाती है तो कहीं केवल घट स्थापन, अखंड ज्योत व जवारे रखकर मां भगवती की आराधना की जाती है। दुर्गा पूजा “दुर्गा सप्तशती” के बिना अधूरी है। इन नौ दिनों में “दुर्गासप्तशती” के पाठ का बहुत महत्व है। कठिन साधना ना कर सकने वाले साधक मात्र मां दुर्गा के चित्र के समीप दीप प्रजवल्लित कर दुर्गासप्तशती का पाठ कर पुण्यफ़ल प्राप्त कर सकते हैं किंतु “दुर्गासप्तशती” का पाठ एक निश्चित विधि अनुसार ही किया जाना श्रेयस्कर है। आईए जानते है “दुर्गासप्तशती” के पाठ की सही विधि-
१. प्रोक्षण (अपने ऊपर नर्मदा जल का सिंचन करना)
२. आचमन
३. संकल्प
४. उत्कीलन
५. शापोद्धार
६. कवच
७. अर्गलास्त्रोत
८. कीलक
९. सप्तशती के १३ अध्यायों का पाठ (इसे विशेष विधि से भी किया जा सकता है)
१०. मूर्ती रहस्य
११. सिद्ध कुंजीका स्त्रोत
१२. क्षमा प्रार्थना

विशेष विधि-
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दुर्गा सप्तशती के १ अध्याय को प्रथम चरित्र। २,३,४ अध्याय को मध्यम चरित्र एवं ५ से लेकर १३ अध्याय को उत्तम चरित्र कहते है। जो साधक पूरा पाठ (१३ अध्याय) का पाठ एक दिन में नहीं कर सकते वे निम्न क्रम में भी इसे कर सकते हैं-
१ दिन- १ अध्याय
२ दिन- २ व ३ अध्याय
३ दिन- ४ अध्याय
४ दिन- ५.६.७.८.अध्याय
५ दिन- ९ व १० अध्याय
६ दिन- ११ अध्याय
७ दिन- १२ व १३ अध्याय
८ दिन- मूर्ती रहस्य,हवन,बलि व क्षमा प्रार्थना
९ दिन- कन्याभोज इत्यादि।
 विभिन्न लग्नों में मंत्र साधना प्रारंभ किए जाने का फल भी भिन्न-भिन्न प्रकार से प्राप्त होता है-
१. मेष लग्न- धन लाभ
२. वृष लग्न- मृत्यु
३. मिथुन लग्न- संतान नाश
४. कर्क लग्न- समस्त सिद्धियां
५. सिंह लग्न- बुद्धि नाश
६. कन्या लग्न- लक्ष्मी प्राप्ति
७. तुला लग्न- ऐश्वर्य
८. वृश्चिक लग्न- स्वर्ण लाभ
९. धनु लग्न- अपमान
१०. मकर लग्न- पुण्य प्राप्ति
११. कुंभ लग्न- धन-समृद्धि की प्राप्ति
१२. मीन लग्न- दुःख की प्राप्ति होती है।

आचमन


“एवं स ब्राह्मणों नित्यमुस्पर्शनमाचरेत्।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यंन्तं जगत् स परितर्पयेत्॥”
प्रत्येक कार्य में आचमन का विधान है। आचमन से हम न केवल अपनी शुद्धि करते हैं अपितु
ब्रह्मा से लेकर तृण तक को तृप्त कर देते हैं।

आचमन विधि-
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आचमन सदैव उत्तर,ईशान या पूर्व दिशा की ओर मुख कर करें। दक्षिण व पश्चिम दिशा की ओर मुख करके आचमन कदापि ना करें।

“ह्त्कण्ठतालुगाभिस्तु यथासंख्यं द्विजातय:।
 शुध्येरन् स्त्री च शूद्रश्च सकृत्स्पृष्टाभिरन्तत:॥”

आचमन के लिए जल इतना लें कि ब्राह्मण के ह्रदय तक,क्षत्रिय के कंठ तक, वैश्य के तालु तक व शूद्र एवं महिलाओं की जीभ तक ही जाए। हथेलियों को मोड़कर गाय के कान जैसा बना लें कनिष्ठा व अंगुष्ठ को अलग रखें। तत्पश्चात जल लेकर तीन बार निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए जल ग्रहण करें-
ॐ केशवाय नम:
ॐ नाराणाय नम:
ॐ माधवाय नम:
 ॐ  ह्रषीकेशाय नम:, बोलकर ब्रह्मतीर्थ (अंगुष्ठ का मूल भाग) से दो बार होंठ पोंछ्ते हुए हस्त प्रक्षालन करें (हाथ धो लें)। उपरोक्त विधि ना कर सकने की स्थिति में केवल दाहिने कान के स्पर्श मात्र से ही आचमन की विधि की पूर्ण मानी जाती है।

"श्रद्धयां इदं श्राद्धम"

"श्रद्धयां इदं श्राद्धम"
-अर्थात अपने पूर्वजों के निमित्त श्रद्धा से किया गया कर्म ही श्राद्ध है।

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शास्त्र का मत है कि यदि कारणवश कोई व्यक्ति श्राद्ध ना कर पाए तो उसे पूर्ण श्रद्धा व भक्तिपूर्वक अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाकर निम्न प्रार्थना करनी चाहिए-

“न मे·स्ति वित्तं न धनं च नान्याच्छ्राद्धपयोग्यं स्वपितृन्नतो·स्मि।
 तृष्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वत्मीने मारुतस्य।”

हे मेरे पितृगण! मेरे पास श्राद्ध के उपयुक्त न तो धन है, न धान्य आदि है। हां मेरे पास आपके लिए श्रद्धा व भक्ति है। मैं इन्हीं के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूं। आप तृप्त हो जाएं। मैंने दोनों भुजाओं को आकाश में उठा रखा है।
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शास्त्रानुसार श्राद्ध में किसी भी ब्राह्मण को भोजन कराने की विधि नहीं है। शील, शौच, प्रज्ञावान, सदाचारी, संध्या-वन्दन करने वाला एवं गायत्री मन्त्र का जप करने वाले श्रोत्रिय ब्राह्मण को ही श्राद्ध में निमन्त्रण देना चाहिए।
"गायत्रीजाप्यनिरतं हव्यकव्येषु योजयेत्"। -(वीरमित्रोदय श्राद्धप्रकाश)
तप,धर्म,दया,दान,सत्य,ज्ञान, वेदज्ञान, कारुण्य, विद्या, विनय तथा अस्तेय (अचौर्य) आदि गुणों से युक्त ब्राह्मण ही इसका अधिकारी है।
"तपो धर्मो दया दानं स्त्यं ज्ञानं श्रुतिर्घृणा ।
विद्याविनयमस्तेयमेतद् ब्राह्मणलक्षणम्॥" -(वीरमित्रोदय श्राद्धप्रकाश)
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शास्त्रानुसार श्राद्ध में भोजन करते समय मौन रहना चाहिए। मांगने या प्रतिषेध का संकेत हाथ से ही करना चाहिए। भोजन कराते समय ब्राह्मण से भोजन कैसा है यह नहीं पूछना चाहिए तथा भोजनकर्ता को भी श्राद्धान्न की प्रशंसा या निन्दा नहीं करनी चाहिए।
"याचनं प्रतिषेधो वा कर्तव्यो हस्तसंज्ञया।
न वदेन्न च हुंकुर्यादतृप्तौ विरमेन्न च॥" - (श्राद्धदीपिका)
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श्राद्धभोक्ता के लिए निम्न आठ वस्तुओं का शास्त्रानुसार निषेध है-
१. पुनर्भोजन (एक ही समय दुबारा भोजन ना करें) २. यात्रा ३. भार ढोना ४. परिश्रम ५. मैथुन ६. दान ७. प्रतिग्रह ८. होम।
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श्राद्ध में निषिद्ध अन्न-
शास्त्रानुसार श्राद्ध में मसूर, अरहर, गाजर, कुम्हड़ा, गोल लौकी, बैंगन, शलजम, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, जीरा, सिंघाड़ा, जामुन, अलसी, चना ये सब श्राद्ध में वर्जित हैं।
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श्राद्ध में लोहे का निषेध-
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श्राद्ध कर्म में लोहे के पात्रों का नहीं करना चाहिए। श्राद्ध कर्म में लोहे का निषेध है। शास्त्रों में तो पाकशाला में लौह पात्रों का निषेध है। शास्त्रानुसार लौह पात्रों ब्राह्मणों को भोजन नहीं कराना चाहिए और ना ही दान में लोहे के पात्र देने चाहिए। लौह दर्शन करते पितर निराश व रुष्ट (नाराज) होकर चले जाते हैं। श्राद्ध कर्म में सदैव सोना, चांदी, कांसा, तांबा आदि का ही प्रयोग करना चाहिए एवं दान भी इन्ही पात्रों का देना चाहिए।
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श्राद्ध में पाद-प्रक्षालन
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श्राद्ध में पाद-प्रक्षालन (पैर धुलाने) का बहुत महत्व है। ब्राह्मण भोजन से पूर्व ब्राह्मणों का पाद-प्रक्षालन किया जाना चाहिए। पाद-प्रक्षालन सदैव ब्राह्मणों को आसन पर बिठाकर करना चाहिए। खड़े-खड़े पाद-प्रक्षालन कराने से पितर रुष्ट (नाराज) होते हैं। पाद-प्रक्षालन करते समय अपनी धर्मपत्नि को अपने दाहिने ओर रखना चाहिए। धर्मपत्नि के वाम भाग में रहते पाद-प्रक्षालन करने से वह श्राद्ध आसुरी हो जाता है और पितरों को प्राप्त नहीं होता।
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श्राद्ध में चांदी की भूमिका-
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श्राद्ध में चांदी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। चांदी का दान करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। शास्त्रानुसार यदि चांदी का दान ना भी कर पाएं तो केवल चांदी के विषय में चर्चा करने मात्र से पितर संतुष्ट हो जाते हैं। अत: अपनी सामर्थ्य अनुसार श्राद्ध में चांदी अवश्य दान करनी चाहिए।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

जगन्नाथ पुरी “रथयात्रा”


जगन्नाथ पुरी में विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा का शुभारंभ आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से होता है। जिसमें भगवान कृष्ण और बलराम अपनी बहन सुभद्रा के साथ रथों पर सवार होकर “श्रीगुण्डीचा” मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे और अपने भक्तों को दर्शन देंगे। जगन्नाथ रथयात्रा प्रत्येक वर्ष की आषाढ़ शुक्ल द्वितीय को प्रारंभ होती है। जो आषाढ़ शुक्ल दशमी तक नौ दिन तक चलती है। यह रथयात्रा वर्तमान मन्दिर से “श्रीगुण्डीचा मंदिर” तक जाती है इस कारण इसे “श्रीगुण्डीचा यात्रा” भी कहते हैं। इस यात्रा हेतु लकड़ी के तीन रथ बनाए जाते हैं- बलरामजी के लिए लाल एवं हरे रंग का “तालध्वज”नामक रथ; सुभद्रा जी के लिए नीले और लाल रंग का “दर्पदलना” नामक रथ और भगवान जगन्नाथ के लिए लाल और पीले रंग का “नन्दीघोष” नामक रथ बनाया जाता है। रथों का निर्माण कार्य अक्षय तृतीया से प्रारंभ होता है। रथों के निर्माण में प्रत्येक वर्ष नई लकड़ी का प्रयोग होता है। लकड़ी चुनने का कार्य बसन्त पंचमी से प्रारंभ होता है। रथों के निर्माण में कहीं भी लोहे व लोहे से बनी कीलों का प्रयोग नहीं किया जाता है। रथयात्रा के दिन तीनो रथों मुख्य मंदिर के सामने क्रमशः खड़ा किया जाता है। जिसमें सबसे आगे बलरामजी का रथ “तालध्वज” बीच में सुभद्राजी का रथ “दर्पदलना” और तीसरे स्थान पर भगवान जगन्नाथ का रथ “नन्दीघोष” होता है। रथयात्रा के दिन प्रातकाल सर्वप्रथम “पोहंडी बिजे” होती है। भगवान को रथ पर विराजमान करने की क्रिया “पोहंडी बिजे” कहलाती है। फिर पुरी राजघराने वंशज सोने की झाडू से रथों व उनके मार्ग को बुहारते हैं जिसे “छेरा पोहरा” कहा जाता है। “छेरा पोहरा” के बाद रथयात्रा प्रारंभ होती है। रथों को श्रद्धालु अपने हाथों से खींचते हैं जिसे “रथटण” कहा जाता है। सायंकाल रथयात्रा “श्रीगुण्डीचा मंदिर” पहुंचती है। जहां भगवान नौ दिनों तक विश्राम करते हैं और अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। मंदिर से बाहर इन नौ दिनों के दर्शन को “आड़प दर्शन” कहा जाता है। दशमी तिथि को यात्रा वापस होती है जिसे “बहुड़ाजात्रा” कहते हैं। वापस आने पर भगवान एकादशी के दिन मंदिर के बाहर ही दर्शन देते हैं जहां उनका स्वर्णाभूषणों से श्रृंगार किया जाता है जिसे “सुनाभेस” कहते हैं। द्वादशी के दिन रथों पर  “अधर पणा” (भोग) के पश्चात भगवान को मन्दिर में प्रवेश कराया जाता है इसे “नीलाद्रि बिजे” कहते हैं।

वर्ष 2015 में मनाया जाएगा पुरी में “नवकलेवर उत्सव”-

जगन्नाथ पुरी में अगले वर्ष 2015 में “नवकलेवर उत्सव” मनाया जाएगा। पुराने काष्ठ निर्मित विग्रहों को समाधि देकर नवीन विग्रहों के निर्माण एवं प्राण-प्रतिष्ठा “नवकलेवर उत्सव” कहा जाता है। यह “नवकलेवर” जिस वर्ष आषाढ़ का अधिक मास (जो कि सामान्यतः 8 व 19 वर्षों के अंतराल पर होता है) आने पर मनाया जाता है। इस उत्सव में दारू वृक्ष के काष्ठ से निर्मित नवीन विग्रहों का निर्माण व उनकी प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। पुराने विग्रहों को मन्दिर परिसर में ही “कोयली वैकुण्ठ” नामक स्थान पर समाधि दे दी जाती है। पूर्व में यह उत्सव वर्ष 1996 में मनाया गया था।

कृष्णभावनामृत


सेस;गनेस;महेस;दिनेस;सुरेसहु;जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि;अनंत;अखंड;अछेद;अभेद;सुबेद बतावै॥
नारद से सुक व्यास रहे पचिहारे तु पुनि पार ना पावै।
ताहि अहीर की छोहरियां छछिया भर छाछ पे नाच नचावै॥

धूरि भरे अति सोहत स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटि।
खेलत खात फिरे अंगना पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटि॥
वा छवि को "रसखान" बिलोकत वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ सौं ले गयो माखन रोटी॥

या लकुटि अरु कामरिया पर राज तिहूं पुर को तजि डारौं।
आठहुं सिद्धि;नवौं निधि को सुख नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
"रसखान" कबौं इन आंखन सौं ब्रज के बन बाग तडा़ग निहारौं।
कोटिक हूं कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं॥


मानुस हौं तो वही "रसखान" बसौ मिलि गोकुल गांव के ग्वारन।
जों पशु हौं तो कहां बस मेरौ, चरौ नित नंद की धेनु मंझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हों तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन॥

ऋण मुक्ति मंत्र


मंगलवार के दिन शिवलिंग पर मसूर की दाल “ऋमुक्तेश्वर महादेवाय नमः” का जाप करते हुए चढ़ाएं। इससे ऋण उतरने लगता है।

दिग्बंध मंत्र


आजकल सभी जगह चोरों का बड़ा प्रकोप है। आज मैं आपको एक प्रयोग बता रहा हूं जिससे चोरों से रक्षा होती है। आप निम्न मंत्र की एक माला कर इस मंत्र को सिद्ध कर लें फिर ७ (सात) बार पढ़कर थोड़ी सी मिट्टी अभिमंत्रित करें। उस मिट्टी को अपने भवन के मुख्य द्वार पर ज़मीन में गाड़ दें। इससे चोरों से हमेशा आपका भवन सुरक्षित रहेगा। मंत्र इस प्रकार है-
“ॐ करालिनी स्वाहा। ॐ कपालिनी स्वाहा। ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं चोर बंध ठः ठः ठः।”

दुःस्वप्न नाशक यंत्र


जिन मित्रों अक्सर दुःस्वप्न आते हों या कभी दुःस्वप्न आ जाए तो निम्न मंत्र का १० बार जाप करने से दुःस्वप्न के फल का नाश हो जाता है और भविष्य में दुःस्वप्न नहीं आते-

“ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं पूर्वदुर्गतिनाशिन्यै महामायायै स्वाहा।”

सुभाषित


बहवो यत्र नेतारः सर्वे पण्डितमानिनः।
सर्वे महत्वमिच्छन्ति एद्राष्ट्रमवसीदति॥
(महाभारत)
जहां बहुत से लोग नेता बन जाते हैं सभी स्वयं को बहुत ज्ञानवान व बुद्धिमान मानते हैं तथा सभी महत्वाकांक्षी होते हैं, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है।

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यस्य नास्ति स्वयंप्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् |
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ||

सोलह श्रृंगार


सोलह श्रृंगार की चर्चा तो आप सभी ने सुनी ही होगी लेकिन क्या आप जानते हैं कि वे सोलह श्रृंगार कौन से हैं, यदि नहीं तो हम आपको बताते हैं। सोलह श्रृंगार निम्न हैं-

अंगशुचि,मंजन,वसन,मांग,महावर,केश।
तिलक भाल,तिल चिबुक में,भूषण मेंहदी वेश।
मिस्सी,काजल,अरगजा,वीरी और सुगंध॥

अर्थात् शरीर पर उबटन लगाना,स्नान करना,स्वच्छ वस्त्र धारण करना,मांग भरना,महावर लगाना,बाल संवारना, टीका या बिंदी लगाना,ठोढ़ी पर तिल बनाना,आभूषण धारण करना,मेंहदी रचाना,दांतो में मिस्सी लगाना,आंखों में काजल लगाना, सुगंधित द्रव्य जैसे इत्र लगाना,पान खाना,माला पहनना और हाथों व केश में गजरा धारण करना।

मणियां


मणियां अनेक प्रकार की होती है किंतु उनमे नौ प्रकार की मणियों को ही मुख्य माना गया है। वे हैं-
१.घृतमणि २.तैलमणि ३.भीष्मकमणि ४.उपलकमणि ५.स्फटिकमणि ६.पारसमणि ७.उलूकमणि ८.लाजवर्तमणि ९.मासरमणि। इनमें पारसमणि व स्फटिकणि का नाम ही ज़्यादा प्रचलन में आता है।(पो.)

तिलक


हमारे शास्त्रों में तिलक लगाने का भी नियम बताया गया है। तर्जनी अंगुली से पितरों (पिंड) को, मध्यमा से स्वयं को, अनामिका से भगवान को एवं अंगुष्ठ (अंगूठे) से यजमान व मेहमान को तिलक करने का विधान है।

आरती


हमारे शास्त्रों में पाँच प्रकार से भगवान की आरती करने का विधान है। जल से भरे शंख द्वारा, साफ वस्त्र के द्वारा, चँवर या पत्तों के द्वारा, पाँच बत्तियों वाले दीपक के द्वारा एवं शाष्टांग दण्डवत के द्वारा।