रविवार, 4 जून 2017

उपचार पूजा


पूजा करना सनातन धर्म का अभिन्न अंग है। ईश्वर ने हमें जीवन दिया है, हम उसे कैसे धन्यवाद दें! इसके समाधान हेतु हमारे शास्त्रों ने दैनिक पूजा का विधान बताया है। पूजा करने के विलग-विलग उद्देश्य होते हैं उनमें सर्वश्रेष्ठ व पवित्र उद्देश्य है ईश्वर के प्रति अपना प्रेम व कृतज्ञता ज्ञापित करना। पूजा का तरीका व्यक्ति की श्रद्धा पर निर्भर है लेकिन हमारे शास्त्रों में पूजा करने के कुछ अनिवार्य अंग बताए गए हैं जिन्हें "पंचोपचार","दशोपचार" व "षोडषोपचार" पूजन कहा जाता है। आईए जानते हैं कि इन उपचार पूजनों के अन्तर्गत क्या अनिवार्य हैं।

पंचोपचार पूजन-
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1. गन्ध 2. पुष्प 3. धूप 4. दीप 5. नैवेद्य

दशोपचार-
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1. पाद्य 2. अर्घ्य 3. आचमन 4. स्नान 5. वस्त्र 6. गन्ध 7. पुष्प 8. धूप 9. दीप 10. नैवेद्य

षोडशोपचार-
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1. पाद्य 2. अर्घ्य 3. आचमन 4. स्नान 5. वस्त्र 6. आभूषण 7. गन्ध 8. पुष्प 9. धूप 10. दीप 11. नैवेद्य 12. आचमन 13. ताम्बूल 14. स्तवन पाठ 15.तर्पण 16.नमस्कार

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया 



शनिवार, 3 जून 2017

क्या भूत-प्रेत होते हैं?


भूत-प्रेत का नाम सुनते ही मन में भय व दहशत व्याप्त हो जाती है। तार्किक लोग भूत-प्रेत के अस्तित्व को सिरे से नकारते हैं वहीं कुछ अन्धविश्वासी सामान्य मनोरोगों को भी भूत-प्रेत से जोड़कर देखते हैं। लेकिन क्या सचमुच भूत-प्रेत होते हैं इस प्रश्न का उत्तर शायद ही किसी को संतुष्ट कर पाता हो। आज हम इसी रहस्य को समझने का प्रयास करेंगे। प्रारम्भिक दौर में विज्ञान भूत-प्रेत के अस्तित्व को खारिज करता आया है लेकिन वर्तमान दौर में वह इन्हें एक दिव्य उर्जा के रूप में स्वीकार करने लगा है। हमारे मतानुसार इस रहस्य को विज्ञान कभी भी नहीं जान पाएगा ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान मशीनी उपकरणों के माध्यम से चेतना को जानने का प्रयास करता है जबकि यह चेतनाएँ जिस एकमात्र उपकरण के माध्यम से जानी जा सकती हैं वह उपकरण है मनुष्य शरीर। हमारा भौतिक शरीर जिसे स्थूल शरीर भी कहा जाता है, कई शरीरों का संग्रहीत रूप है। हमारे स्थूल शरीर के भीतर अन्य शरीरों की पर्तें होती हैं। इन शरीरों को सूक्ष्म शरीर, आकाश शरीर, मनस शरीर, आत्मिक शरीर, ब्रह्म शरीर व निर्वाण शरीर कहा जाता है। जिसे सामान्य भाषा में भूत-प्रेत कहा या समझा जाता है वह वास्तविक रूप में मनुष्य का सूक्ष्म शरीर होता है। इस सूक्ष्म शरीर में मनुष्य की सारी भावनाएँ, मन, स्मृतियाँ व अन्य शरीर संग्रहीत रहते हैं। सामान्य मृत्यु में व्यक्ति का केवल भौतिक या स्थूल शरीर ही नष्ट होता है। सूक्ष्म शरीर आगे की यात्रा के लिए बचा रह जाता है। इसी सूक्ष्म शरीर के कारण मनुष्य को अगला जन्म प्राप्त होता है। यह सूक्ष्म शरीर आवागमन का आधार है। सूक्ष्म शरीर जब तक भौतिक शरीर धारण नहीं कर लेता है तब तक उसकी संसार में स्थिति व उपस्थिति को ही भूत-प्रेत के नाम से जाना जाता है। सरल शब्दों में भूत-प्रेत वास्तव में मनुष्य का सूक्ष्म शरीर ही है। सामान्यत: साधारण जीवात्माएँ मृत्यु के उपरान्त बहुत शीघ्र ही नया जन्म ले लेती हैं लेकिन कुछ असाधारण जीवात्माएँ; जिनमें बहुत श्रेष्ठ जिन्हें हम देवताओं की श्रेणी में रखते हैं और बहुत निकृष्ट जिन्हें हम भूत-प्रेत की श्रेणी में रखते हैं,अपने स्वभावगत कारणों व वासनाओं के कारण नया जन्म लेने में विलम्ब करती हैं। इस काल में ये जीवात्माएँ सूक्ष्म शरीर के रूप में संसार में विद्यमान रहती हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में ये जीवात्माएँ साँसारिक मनुष्यों के सम्पर्क में आकर अपनी उपस्थिति का अहसास भी कराती हैं लेकिन ये बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में होता है। जिसे प्रचलित भाषा में बाबा,देव,माता,भूत-प्रेत इत्यादि नामों से जाना जाता है। अक्सर समाज में भूत-प्रेत का भय दिखाकर जनमानस का शोषण किया जाता है। यह सर्वथा अनुचित है। सूक्ष्म शरीर का साँसारिक क्रियाकलापों में हस्तक्षेप बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में होता है। अत: ना तो इन सूक्ष्म शरीरों से अत्यधिक भयभीत होने की आवश्यकता है और ना इनके अस्तित्व को सिरे से नकारना ही उचित है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 22 मई 2017

महाभारत का महागणित

महाभारत का नाम सुनते ही जो सबसे पहली बात ध्यान में आती है वह यह कि इस युद्ध में लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहूति दी थी। कुछ विद्वानों के अनुसार तो महाभारत के युद्ध में करोड़ों सैनिक मारे गए थे। हालांकि उस काल में इस देश की जनसंख्या के अनुपात में यह बात अतिश्योक्ति ही लगती है लेकिन एक बात निश्चित है कि महाभारत के युद्ध में मारे गए सैनिकों की कोई प्रामाणिक संख्या आज तक बताई नहीं जा सकी लेकिन सामरिक ग्रन्थों में अक्षौहिणी सेना का जो वर्णन है उस आधार पर आज मैं आपको महाभारत युद्ध में मारे गए सैनिकों की प्रामाणिक संख्या बताने जा रहा हूँ। यह संख्या मैंने गणना के आधार प्राप्त की है। आप स्वयं भी इसकी गणना कर सकते हैं।
जैसा कि आपको विदित है महाभारत के युद्ध में पाण्डवों के पास 7 अक्षौहिणी सेना व कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी सेना थी। आईए जानते हैं कि 1 अक्षौहिणी सेना में क्या-क्या होता है।
1 अक्षौहिणी सेना-
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महाभारत काल में सेना की सबसे छोटी ईकाई को "पती" कहते थे।
1 पती के अन्तर्गत होता था-
1 रथ, 1 हाथी, 3 घोड़े एवं 5 पैदल सैनिक।
3 पति को 1 सेनामुख कहा जाता था अर्थात्...
3 पति = 1 सेनामुख
3 सेनामुख = 1 गुल्म
3 गुल्म = 1 गण
3 गण = 1 वाहिनी
1 वाहिनी = 1 पृतना
3 पृतना = 1 चमू
3 चमू = 1 अनीकिनी
10 अनीकिनी = 1 अक्षौहिणी सेना
अत: उपर्युक्त गणना के आधार पर 1 अक्षौहिणी सेना में होते हैं-
रथ संख्या-  21,870
हाथी-  21,870
घोड़े-  65,610
पैदल सैनिक- 1,09,350
अत: इस आधार पर महाभारत के युद्ध में प्रयुक्त हुई कुल 18 अक्षौहिणी सेना में थे-
कुल रथ- 3,93,660
कुल हाथी- 3,93,660
कुल घोड़े- 11,80,980
पैदल सैनिक- 19,68,300
अब यदि पैदल सैनिक+रथी+घुड़सवार+गजसवार इन सभी को सम्मिलित किया जाए तो 18 अक्षौहिणी सेना के कुल सैनिकों व योद्धाओं की संख्या बनती है-

47 लाख 43 हज़ार 920 योद्धा....ये सभी महाभारत के युद्ध में मारे गए थे।


निवेदन- उपर्युक्त संख्या अक्षौहिणी सेना की व्यवस्था के आधार पर प्राप्त हुई है जो पूर्णत: सत्य तो नहीं किन्तु किसी भी अतिश्योक्तिपूर्ण संख्या को परखने की कसौटी अवश्य है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)

रविवार, 21 मई 2017

भारत का नामकरण


आप सभी को विदित है हमारे देश का नाम "भारत" चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के नाम पर पड़ा है किन्तु क्या आप यह जानते हैं कि ये भरत कौन थे? निश्चय ही आपका उत्तर होगा "दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र", लेकिन यह असत्य है। ये बात सही है कि दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र का नाम भी भरत था किन्तु इन भरत के नाम पर इस देश का नाम भरत नहीं रखा गया। इस देश का नाम भारत जिन चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के नाम पर रखा गया वे ऋषभदेव-जयन्ती के पुत्र थे। ये वही ऋषभदेव हैं जिन्होंने जैन धर्म की नींव रखी। ऋषभदेव महाराज नाभि व मेरूदेवी के पुत्र थे। महाराज नाभि और मेरूदेवी की कोई सन्तान नहीं थी। महाराज नाभि ने पुत्र की कामना से एक यज्ञ किया जिसके फ़लस्वरूप उन्हें ऋषभदेव पुत्र रूप में प्राप्त हुए। ऋषभदेव का विवाह देवराज इन्द्र की कन्या जयन्ती से हुआ। ऋषभदेव व जयन्ती के सौ पुत्र हुए जिनमें सबसे बड़े पुत्र का नाम "भरत" था। भरत चक्रवर्ती सम्राट हुए। इन्हीं चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" पड़ा। इससे पूर्व इस देश का नाम "अजनाभवर्ष" या "अजनाभखण्ड" था क्योंकि महाराज नाभि का एक नाम "अजनाभ" भी था। अजनाभ वर्ष जम्बूद्वीप में स्थित था, जिसके स्वामी महाराज आग्नीध्र थे। आग्नीध्र स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र थे। प्रियवत समस्त भू-लोक के स्वामी थे। उनका विवाह प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती से हुआ था। महाराज प्रियव्रत के दस पुत्र व एक कन्या थी। महाराज प्रियव्रत ने अपने सात पुत्रों को सप्त द्वीपों का स्वामी बनाया था, शेष तीन पुत्र बाल-ब्रह्मचारी  थे। इनमें आग्नीध्र को जम्बूद्वीप का स्वामी बनाया गया था। श्रीमदभागवत (५/७/३) में कहा है कि-
"अजनाभं नामैतदवर्षभारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति।"
इस बात के पर्याप्त प्रमाण हमें शिलालेख एवं अन्य धर्मंग्रन्थों में भी मिलते हैं। अग्निपुराण में स्पष्ट लिखा है-
"ऋषभो मरूदेव्यां च ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
ऋषभोऽदात् श्री पुत्रे शाल्यग्रामे हरिंगत:,
भरताद् भारतं वर्ष भरतात् सुमतिस्त्वभूत॥"
वहीं स्कन्द पुराण के अनुसार-
"नाभे: पुत्रश्च ऋषभ ऋषभाद भरतोऽभवत्।
तस्य नाम्ना त्विदं वर्षं भारतं चेति कीर्त्यते॥"
(माहेश्वर खण्ड)
इसका उल्लेख मार्कण्डेय पुराण व भक्तमाल आदि ग्रन्थों में भी मिलता है। अत: दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" होना केवल एक जनश्रुति है सत्य नहीं।

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया

रविवार, 30 अप्रैल 2017

वस्तुएं आवश्यकता की पूर्ती करने वाली हों, अहंकार की नहीं-

कल मैं एक यात्रा पर था। मैंने ट्रेन में अपने आसपास देखा तो पाया लगभग सभी यात्रियों के पास मोबाईल था। अधिकांश के पास बड़े मंहगे मोबाईल हैण्डसेट थे वहीं कुछ के पास सामान्य। आश्चर्य की बात तो यह थी कि बात दोनों ही से एक समान हो रही थी। मेरे देखे हमारे दैनिक जीवन की वस्तुएं हमारी आवश्यकता की पूर्ती करने वाली होना चाहिए ना कि हमारे अहंकार की पूर्ती करने वाली, यही धार्मिकता का लक्षण है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

आईए परमधन खोजें-

नोटबन्दी के निर्णय को यदि हम आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इस फ़ैसले ने हमें आईना दिखाया है। आज हमें उस तथाकथित मूल्यवान समझे जाने वाले धन की हकीकत का पता चला है जिसके लिए हम कभी-कभी अपनी आत्मा तक को दांव पर लगा देते हैं। एक कागज़ के पुर्ज़े पर लिखे कुछ शब्दों से वे कागज़ के टुकड़े महज़ कागज़ ही बनकर रह गए जिनके लिए हम सब दिन-रात आपाधापी कर रहे थे। ज़रा सोचिए भला हम इस धन के लिए अपने जीवन को खपाए दे रहे थे जिसे एक व्यक्ति; एक आदेश "व्यर्थ" और मूल्यहीन बना सकता है! यदि हां तो हमसे अधिक मूढ़ इस जगत में खोजना मुश्किल है। आईए अब थोड़ा उस परमधन की खोज करें जिसे संसार की कोई शक्ति मूल्यहीन नहीं बना सकती। वह धन हमें जन्म से मिला ही हुआ है बस उस तिजोरी को खोलना है जिसमें वह धन है। वह तिजोरी खुलती है- ध्यान व प्रेम से, फिर प्राप्त होता है वह परमधन जिसके बारे में मीराबाई कहती हैं-"राम रतन धन पायो।"

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 5 मार्च 2017

"कही जाए सो व्यथा, बही जाए सो कथा"

आज हमारे चहुँओर कहीं ना कहीं भागवत कथा या रामकथा का आयोजन होता हुआ दिखाई देता है। दूसरी ओर समाज में निरन्तर कुछ ऐसी घटनाएँ भी घटित होती रहती हैं जिनसे यह प्रतीत होता है कि हमारा समाज शीघ्रता से अनैतिकता की ओर अग्रसर हो रहा है। समाज में अनैतिकता को यदि रोग की संज्ञा दी जाए और इन कथाओं व उपदेशों को औषधि की तो निष्कर्ष यह निकलता है कि औषधि यदि कारगर है तो रोग नष्ट होना चाहिए। यदि रोग नष्ट होने के स्थान पर बढ़ रहा है तो औषधि ठीक नहीं है। मेरे देखे आज के अधिकांश कथावाचक अभिनेता हैं; साधक नहीं। अभिनेता होना एक बात है, साधक होना बिल्कुल दूसरी बात। कथा समय के ३ घण्टे अभिनय को कथा के अनुरूप साधा जा सकता है किन्तु सम्पूर्ण जीवन को कथाओं के बताए अनुसार परिवर्तित कर लेना बड़ी साधना है। आजकल के अधिकतर सदगुरू लोगों को जगाते कम; सुलाते अधिक हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण है पहले तो वे खुद ही सोए हुए हैं क्योंकि जो स्वयं ही सोया है वह किसी और क्या जगाएगा और दूसरा जिस दिन उन्होंने लोगों को जगाना प्रारम्भ कर दिया उसी दिन से उनका विरोध होना शुरू हो जाएगा क्योंकि शारीरिक नींद ही इतनी मीठी और गहरी होती है तो चित्त की निद्रा की तो बात ही क्या, जब उसे तोड़ा जाता है तो बहुत कष्ट होता है इसीलिए उस निद्रा को तोड़ने वाले का विरोध होना स्वाभाविक है। विरले ही इस प्रकार की साधना में प्रवृत्त हो पाते हैं। जिस प्रकार यदि हम किसी पात्र को किसी वस्तु से भरते जाएं और जब वह पात्र पूर्णरूपेण भर जाए तब क्या होगा! वह वस्तु उस पात्र के ऊपर से बहने या झलकने लगेगी। ठीक उसी प्रकार जब हम अपने अन्त:करण को परमात्मतत्व रूपी गुण से भरते जाते हैं और हमारा यह अन्तर्घट जब पूर्ण हो जाता है तब जो झलकने लगता है वही सच्चा उपदेश व सही कथा है। मेरे देखे जो सप्रयास कही जाए वह व्यथा, जो अनायास बही जाए वह कथा है। जब साधक की वाणी निमित्त मात्र बनकर उपकरण का कार्य करती है तब मुख से जो निकलता है वह दिव्य होता है क्योंकि वह अलौकिक होता है। तब वह किसी और तल का; किसी और जगत का होता है, साधक तो केवल एक निमित्त और उपकरण मात्र होता है। जिस दिन इस प्रकार कथाएं व उपदेश कहे जाएंगे उसी दिन से समाज परिवर्तित होना प्रारम्भ हो जाएगा। !! राधे...राधे....!!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया