शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

अभय

अभयं मित्रादभयममित्रादभयमं ज्ञातादभयं परोक्षात्।
अभयं नक्तमभयं दिवा न: सर्वा आशामममित्र भवन्तु॥
-अर्थववेद, १९.१५.६
अर्थ-मुझे मित्र या शत्रु का भय न हो, मुझे ज्ञात और अज्ञात का भी भय न हो, रात और दिन का भी भय न हो। पूर्व,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण सभी दिशाएँ मेरे प्रति मित्रवत् भाव रखें। 

गुरु वन्दना

राम तजूं पै गुरु न बिसारूं।
गुरु को सम हरि को न निहारूं॥
हरि ने जनम दियो जग माहीं।
गुरु ने आवागमन छुटाहीं॥
हरि ने पांच चोर दिए साथा।
गुरु ने लई छुटाय अनाथा॥
हरि ने कुटुम्ब जाल में गेरी।
गुरु ने काटी ममता बेरी॥
हरि ने रोग भोग उरझायौ।
गुरु जोगी कर सबै छुटायौ॥
हरि ने कर्म धर्म भरमायौ।
गुरु ने आतम रूप लखायौ॥
हरि ने मोसूं ने आप छिपायौ।
गुरु दीपक दै ताहि दिखायौ॥
फिर हरि बंधि मुक्ति गति लाए।
गुरु ने सबही भरम मिटाए॥
चरणदास पर तन मन वारूं।
गुरु न तजूं हरि को तज डारूं॥
- संत सहजोबाई

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

संतन को कहां सीकरी सों काम ?

संतन को कहां सीकरी सों काम ?
आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरि नाम।।
जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परी सलाम।।
"कुम्भनदास" लाल गिरिधर बिनु और सबै बेकाम।।
-कुम्भनदास
कुम्भनदास(१४६८-१५८३) अष्टछाप के प्रसिद्ध कवि थे। ये परमानंददास जी के समकालीन थे। कुम्भनदास का चरित "चौरासी वैष्णवन की वार्ता" के अनुसार संकलित किया जाता है। कुम्भनदास ब्रज में गोवर्धन पर्वत से कुछ दूर "जमुनावतौ" नामक गाँव में रहा करते थे। उनके घर में खेती-बाड़ी होती थी। अपने गाँव से वे पारसोली चन्द्रसरोवर होकर श्रीनाथ जी के मन्दिर में कीर्तन करने जाते थे। उनका जन्म गौरवा क्षत्रिय कुल में हुआ था। कुम्भनदास के सात पुत्र थे, जिनमें चतुर्भजदास को छोड़कर अन्य सभी कृषि कर्म में लगे रहते थे। उन्होंने १४९२ ई० में महाप्रभु वल्लभाचार्य से दीक्षा ली थी। वे पूरी तरह से विरक्त और धन, मान, मर्यादा की इच्छा से कोसों दूर थे। एक बार अकबर बादशाह के बुलाने पर इन्हें फतेहपुर सीकरी जाना पड़ा जहाँ इनका बड़ा सम्मान हुआ। पर इसका इन्हें बराबर खेद ही रहा, जैसा कि इनके उपर्युक्त पद से व्यंजित होता है।

अष्टछाप के कवि-
१.कुम्भनदास २.कृष्णदास ३.गोविन्दस्वामी ४. चतुर्भुजदास ५.छीतस्वामी ६.नन्ददास ७.परमानन्द दास ८. सूरदास

काफ़िर हैं वो जो बन्दे नहीं हैं इस "लाम" के...

एक बार मुगल बादशाह शाहजहाँ ने दिल्ली में एक विराट मुशायरे का आयोजन किया। उसमे मुस्लिम ही नही अपितु हिन्दू कवियों ने भी भाग लिया। सर्वप्रथम गजलों एवं शेरों-सायरी का कार्यक्रम हुआ,पश्चात "समस्या-पूर्ति"का। 'समस्या-पूर्ति में कोई कवि स्व रचित एक पंक्ति अन्य कवियों को सुनाता हैं तथा उनसे उस पंक्ति से सन्दर्भ जमाते हुए अन्य पंक्तियाँ कहने का आह्वान करता हैं। एक मुस्लिम कवि ने 'समस्या-पूर्ति' के लिए निम्न पंक्ति कही-
"काफ़िर हैं वो, जो बंदे नही इस्लाम के"।
स्पष्ट रूप से संकेत हिंदूओ की ओर था। और उन्हें ही समस्या का समाधान करना था।
पंक्ति सुनकर जहाँ मुस्लिम कवियो में ख़ुशी की लहर फैल गई, वही हिन्दू कुछ दुविधा में पड़ गये। उनके द्वारा समस्या-पूर्ति न करने से इस्लाम धर्म के अनुयायी न होने से वे काफ़िर सिद्ध होते थे। ये जानबूझ कर किया गया अपमान था। कुछ हिन्दू कवि मन ही मन बौखला गये, कि कवि जगन्नाथ पंडित उठ खड़े हुए और ऊँचे स्वर में बोले--
इस "लाम" के मानिंद हैं,गेसू मेरे घनश्याम के।
काफ़िर हैं वो, जो बन्दे नहीं इस"लाम" के।।
यह सुनते ही उपस्थित हिन्दू जनसमूह ने बेहद प्रसन्न होकर तालियाँ बजना आरंभ कर दिया,क्योंकि पासा पलट गया था और उस मुस्लिम कवि को लेने के देने पड़ गये थे।
उपर्युक्त पंक्ति का भावार्थ निम्न था-"मेरे कृष्ण के बाल (गेसू) उर्दू अक्षर 'लाम 'की तरह तिरछे हैं। इस दुनिया में उनके इन बालों के जो भक्त नहीं,वे काफ़िर हैं।"
श्री कृष्ण के घुँघराले बाल हैं और उर्दू के अक्षर लाम का आकार घुँघराले बालों जैसा ही होता हैं।"

*विशेष- उर्दू में "ल" अक्षर को लाम कहा जाता है और "लाम"  ل   के आकार का होता है कृष्ण के बाल भी इसी तरह मुड़े हुए थे.

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

होशपूर्ण जीवन धार्मिकता का लक्षण है

एक बार मैंने कार में बैठे एक शख़्स को देखा जो गेरूए रंग का कुर्ता पहने हुए था; कुर्ते  पर "ॐ" और गायत्री मन्त्र अंकित था। अगले ही क्षण उसने अपना हाथ बाहर निकाला और अंगुलियों में दबी सिगरेट का गुल भूमि पर गिरा दिया । मैंने सोचा हम कितनी मूर्च्छा; कितनी बेहोशी में अपना जीवन जीते हैं यह इसका छोटा सा उदाहरण मात्र है। मेरे देखे होश एकमात्र धार्मिकता का लक्षण है और होशपूर्ण व्यक्ति ही धार्मिक है। बेहोशी; मूर्च्छा अधार्मिकता है। हम सब दिन के चौबीसों घंटे बेहोशी में जी रहे हैं, बिल्कुल यन्त्रवत। इसीलिए समाज में इतनी अधार्मिकता है क्योंकि धार्मिक कृत्य भी बेहोशी में ही किए जा रहे हैं। यदि होशपूर्वक जीवन जाए तो मुक्ति हो जाती है। मैं पूर्ण विश्वास से कहता हूं कि होशपूर्वक यदि पापकर्म भी कर लिया जाए तो पाप से मुक्ति हो जाती है क्योंकि पापकर्म होते ही तब है जब व्यक्ति मूर्च्छित होता है, जागृति और पाप का सम्बन्ध है ही नहीं, ठीक उसी प्रकार जैसे अन्धकार और दीपक का। मूर्च्छा अन्धकार है और होश जागृति; जागरण। अभी-अभी नवरात्र का पर्व सम्पन्न हुआ है इसमें कई देवी पण्डालों में जाने का अवसर मिला वहां जो पूजा-पाठ करने वाले लोग थे उन्हें अन्य दिनों में भी कार्य करते देखा था, महद्आश्चर्य था...इतनी श्रद्धा, इतनी भक्ति, प्रणाम करने को मन किया किन्तु उन्हीं लोगों के कार्य नवरात्र समाप्त होते ही बिल्कुल परिवर्तित हो गये! कृत्रिमता धार्मिकता का लक्षण नहीं है। मेरे लिए होश का अर्थ है जीवन में प्रतिपल परमात्मा की मौजूदगी; उसके सामीप्य की अनुभूति करना। इस प्रकार जीवन जीना जैसे परमात्मा प्रतिपल आपके साथ, आपके निकट है। बस इतना सा होश सध जाए जीवन परिवर्तित हो जाता है। आज हमारे जीवन में कहीं भी परमात्मा की उपस्थिति का अहसास या आभास दिखाई नहीं देता तभी तो समाज में इतनी अधार्मिकता और मानव के कर्मों में इतना भ्रष्टाचार है। हमने परमात्मा को अपने अहंकार की तुष्टि का साधन मात्र बनाकर रख दिया है। मेरे देखे इस जगत् में परमात्मा ही एकमात्र साध्य है। जिसने साध्य को ही साधन बना लिया उससे भला क्या आशा की जा सकती है। हमने परमात्मा को एक सजावट की वस्तु की तरह अपने जीवन में सजा रखा है। उसके सामने हम मज़े से स्वच्छंद होकर वह सब करते हैं जो हमें रुचता है, इस बात की तनिक भी चिन्ता नहीं करते कि ईश्वर को क्या पसन्द है। ईश्वर के सामने झूठ बोलते हैं; छल-कपट करते हैं; लालच करते हैं; ईर्ष्या करते हैं; कुदृष्टि डालते हैं और सबसे बड़ा अपराध प्रतिपल अपने "मैं" के पोषण और दूसरों के शोषण में लगे रहते हैं। मेरे देखे बस एक होश सध जाए फिर किसी पूजा-पाठ किसी कर्मकाण्ड की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती होशपूर्वक जो किया जाता है वह पूजा बन जाता है, जो बोला जाता वह शास्त्र बन जाता है। अत: अपनी मूर्च्छा को तोड़ने का प्रयास करें और होशपूर्ण जीवन की ओर एक कदम बढ़ाएं। परमात्मा प्रतिपल आपके साथ है और सदैव रहेगा।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

धम्मपद सूत्र

कुम्भकूपं कायमिमं विदित्वा नगरूपमं चित्तमिदंठपेत्वा।
योजेथ मारंपंचायुधेन जितं च रक्खे अनिवेसिनोसिया॥
-धम्मपद (चित्तवग्ग...८)
अर्थ- हे योगीगण! क्षणभंगी देह को घट के समान मानकर तथा अपने मन को नगर के समान जानकर प्रज्ञा शस्त्र से संसार; शत्रु कामदेव के साथ घोर युद्ध करे। जीती हुई नवीन समाधि का सावधानी से प्रतिपालन करो। परन्तु उस समाधि में आसक्त न हो।

न परेसं विलोमानि न परेसं कताकतं।
अत्त्नोव अवेक्खेय्य कतानि अकतानि च ॥
-धम्मपद (पुप्फवग्ग...६)
अर्थ- दूसरों के पाप कर्म को न देखना, दूसरों का किया हुआ कर्म और न किये हुए कर्म का भी विचार नहीं करना चाहिये। अपने किये हुए कर्म और न किये हुए कर्म का ही विचार करना चाहिये।

यथापि रुचिरं पुप्फं वण्णवन्तं अगन्धकं।
एवं सुभासिता वाचा अफला होति अकृव्वतो॥
-धम्मपद (पुप्फवग्ग....७)
अर्थ- जैसे मनोहारी फूल सुगन्धि के बिना निष्प्रयोजन एवं अनुपयोगी होता है, वैसे सदुपदेश भी उत्तम आचरण एवं सद्व्यवहार के बिना निष्फल हो जाता है।

यथापि रुचिरं पुप्फं वण्णवतं सगन्धकं।
एवं सुभासिता वाचा सफला होति कुव्वतो॥
-धम्मपद (पुप्फवग्ग....८)
अर्थ-जैसे मनोहारी फूल में सुगन्ध व्याप्त होने से वह सबका आदरणीय होता है, वैसे सदुपदेश भी उत्तम आचरण करने से सफल होता है।

न पुप्फगन्धो पटिवातमेति न चन्दनं तग्गरमल्लिका या।
सतं च गंधो पटिवातमेति सब्बा दिसा सप्पूरिसो पवायति॥
-धम्मपद (पुप्फवग्ग....१०)
अर्थ-चन्दन,तगर और मल्लिका इत्यादि फूलों की सुगन्ध वायु से विपरीत नहीं जा सकती लेकिन सज्जनों का यश व कीर्ति वायु की गति के विपरीत सब दिशा में फैलता है।

दीघा जागरतो रत्ति दीघं सन्तस्स योजनं।
दीघो बालानं संसारो सद्धम्मं अविजानतं॥
-धम्मपद (बालवग्ग...१)
अर्थ-जागने वाले व्यक्ति के लिये रात्रि बड़ी मालूम होती है। थके हुए यात्री के लिए कम दूरी का मार्ग भी बहुत दूर मालूम होता है, वैसे ही मूर्खों के लिये संसारयात्रा बड़ी कठिन होती है।

चरंचे नाधिगच्छेय्य सेय्यं सदिसमत्तनो।
एक चरियं दल्हं कयिरा नत्थि वाले सहायता॥
-धम्मपद (बालवग्ग...२)
अर्थ-अपने समान या अपने से बढ़कर श्रेष्ठ मित्र की खोज करो। यदि न मिले तो अकेले ही दृढ़ता से विचरो, क्योंकि दुष्टजनों से मित्रता ठीक नहीं रहती।

योबालो मंचति बाल्यं पण्डितो वापि तेन सो।
बालो च पण्डितमानी स वे बालोति वुच्चति॥
-धम्मपद (बालवग्ग...४)
अर्थ-जो मूर्ख व्यक्ति अपनी मूर्खता को जानता है, वह पण्डित है। जो मूर्ख अपने को पण्डित मानता है, वही महामूर्ख है।

भीड़ नहीं आनन्द हो कसौटी

मुझे यदा-कदा अनेक महापुरूषों,कथावाचकों व विद्वानों से भेंट का सुअवसर प्राप्त होता ही रहता है। क्षेत्र की समानता के कारण अक्सर मुलाकातें निजी हो जाया करती हैं। मैंने इन मुलाकातों में पाया है कि आजकल भीड़ व प्रचार विद्वत्ता की कसौटी बनता जा रहा है। ये विद्वत्तजन अपने निजी पलों में इन्हीं दो मुद्दों पर बातचीत करते नज़र आते हैं। उन्हें इस बात की महती चिन्ता रहती है कि उनकी कथा में भीड़ अन्य कथावाचकों की अपेक्षा कहीं कम तो नहीं हो रही या फ़लां व्यक्ति का कार्यक्रम वे केवल इस आधार पर असफ़ल मान लेते हैं कि वहां जनता की भीड़ कम थी। मुझे मन ही मन बड़ा आश्चर्य होता है कि भला भीड़ कैसे किसी धार्मिक कार्यक्रम की सफ़लता या असफ़लता की कसौटी हो सकती है। धार्मिक आयोजनों की सफ़लता की कसौटी तो आनन्द होना चाहिए। यदि एक व्यक्ति भी धार्मिक आयोजन में आनन्दित और प्रभु प्रेम में निमग्न हो गया तो आयोजन सफ़ल हो गया। मेरे देखे भीड़ की चिन्ता तो व्यापारी व दुकानदार करते हैं सन्त नहीं, यदि आप किसी ऐसे तथाकथित सन्त या कथावाचक को भीड़ की चिन्ता करते देखें तो समझ लीजिए आप सन्त के धोखे में किसी दुकानदार के पास पहुंच गए हैं। परमात्मा तक को विक्रय की वस्तु बना लेने वाले ये व्यापारीगण भला आपको क्या परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग दिखा पाएंगे। अत: आध्यात्म की राह में तो बस प्रभु को ही अपना सारथि बना लीजिए फ़िर सब अपने से हो जाता है। वही आपको गुरू से भी मिलाएगा और मज़े की बात यह है कि फ़िर वही उस गुरू के माध्यम से स्वयं अपने आपको अर्थात गोविन्द को भी मिला देगा।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया