गुरुवार, 7 जून 2018

भारतवर्ष का शास्त्रोक्त इतिहास


शास्त्रानुसार हमारी सम्पूर्ण पृथ्वी सात द्वीपों का संयुक्त स्वरूप है। ये सात द्वीप हैं-
1. कुशद्वीप
2. क्रौंचद्वीप
3. जम्बूद्वीप
4. प्लक्षद्वीप
5. शाल्मद्वीप
6. शाकद्वीप
7. पुष्करद्वीप
इन सातों द्वीपों के स्वामी अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी के अधिपति महाराज अम्बरीश जो राजर्षि नाभाग के पुत्र थे। राजर्षि नाभाग वैवस्वत मनु के पुत्र थे। कालान्तर में जम्बूद्वीप के राजा हुए महाराज आग्नीध्र, जिनके नौ यशस्वी पुत्र थे-
1.नाभि (जिनका एक नाम अजनाभ भी था) 2. हरिवर्ष 3. हिरण्मय 4. केतुमाल 5. किम्पुरूष
6. इलावृत 7. रम्यक 8. कुरु 9. भद्राश्व।
महाराज आग्नीध्र ने अपने आधिपत्य वाले जम्बूद्वीप को अपने पुत्रों में बराबर-बराबर विभक्त कर दिया था। जिसमें महाराज नाभि के हिस्से वाले भूभाग को "नाभिखण्ड या अजनाभवर्ष" कहा जाने लगा। महाराज नाभि का विवाह मेरूदेवी से हुआ था। महाराज नाभि एवं मेरूदेवी की कोई सन्तान नहीं थी इसलिए उन्होंने सन्तान की कामना से एक यज्ञ किया। इस यज्ञ से प्रसन्न होकार भगवान ने स्वयं उनके यहाँ पुत्र रूप में अवतार लिया। जिसे शास्त्रों में "ऋषभ-अवतार" कहा गया। महाराज नाभि व मेरूदेवी के पुत्र भगवान ऋषभदेव का विवाह इन्द्र की कन्या जयन्ती से हुआ। भगवान ऋषभदेव व जयन्ती के सौ पुत्र हुए जिनमें ज्येष्ठ पुत्र का नाम "भरत" था। इन्हीं राजर्षि भरत के नाम पर हमारे देश का नाभ "भारतवर्ष" पड़ा। नाभिखण्ड के सदृश ही इसे "भरतखण्ड" भी कहा जाने लगा। इसका प्रमाण हमें कर्मकाण्ड व पूजा-पाठ इत्यादि के संकल्प लेते समय भी मिलता है जब संकल्प के उच्चारण में "जम्बूद्वीपे भरतखण्डे..." बोलकर संकल्प लिया जाता है। वर्तमान भारतवर्ष प्राचीन समय के जम्बूद्वीप का "भरतखण्ड" नामक भूभाग ही है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com                                       

विविध स्नान



हमारे शास्त्रों में मानसिक शुद्धि के साथ ही शारीरिक शुचिता को भी बहुत महत्त्व दिया गया है। कहते हैं स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है और शरीर के स्वस्थ रहने के लिए शरीर को स्वच्छ रखना बहुत आवश्यक है। शारीरिक स्वच्छता में स्नान की अग्रणी भूमिका है। प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक स्वच्छता के लिए प्रतिदिन स्नान करना आवश्यक है। हमारे शास्त्रों में स्नान किए बिना मन्दिर प्रवेश, पूजा-पाठ व भोजन करने का निषेध बताया गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि विधिपूर्वक किया गया स्नान जन्मपत्रिका के ग्रहजनित दोषों को दूर करने में सहायक होता है! आज हम "आध्यात्मवाणी" के पाठकों के लिए ग्रहजनित दोषों को दूर करने के लिए स्नान की कुछ विशेष प्रक्रिया का वर्णन करेंगे।
-नवग्रह शान्ति विधान में जन्मपत्रिका के अनिष्ट ग्रहों के दुष्प्रभावों का शमन करने के लिए औषधि स्नान की प्रक्रिया है जिसमें अनिष्ट ग्रह से सम्बन्धित सामग्री के मिश्रित जल से स्नान किया जाता है। इन सामग्रियों को प्रतिदिन स्नान के जल में मिश्रित कर स्नान करने से अनिष्ट ग्रहों के दुष्प्रभाव में कमी आती है। आईए जानते हैं कि नवग्रहों की शान्ति के लिए कौन-कौन सी सामग्रियां स्नान के जल में मिलाने से लाभ होता है-
1. सूर्य- सूर्य के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिदिन स्नान के जल में इलायची,केसर,रक्त-चन्दन,मुलेठी एवं लाल पुष्प मिलाकर स्नान करने से लाभ होता है।
2. चन्द्र- चन्द्र के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिदिन स्नान के जल में पंचगव्य, श्वेत चन्दन एवं सफ़ेद पुष्प मिलाकर स्नान करने से लाभ होता है।
3. मंगल- मंगल के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिदिन स्नान के जल में रक्त-चन्दन,जटामांसी,हींग व लाल पुष्प मिलाकर स्नान करने से लाभ होता है।
4. बुध- बुध के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिदिन स्नान के जल में गोरोचन,शहद,जायफ़ल एवं अक्षत मिलाकर स्नान करने से लाभ होता है।
5. गुरू- गुरू के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिदिन स्नान के जल में हल्दी,शहद,गिलोय,मुलेठी एवं चमेली के पुष्प मिलाकर स्नान करने से लाभ होता है।
6. शुक्र- शुक्र के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिदिन स्नान के जल में जायफ़ल, सफ़ेद इलायची,श्वेत चन्दन एवं दूध मिलाकर स्नान करने से लाभ होता है।
7. शनि- शनि के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिदिन स्नान के जल में सौंफ़, खसखस, काले तिल एवं सुरमा मिलाकर स्नान करने से लाभ होता है।
8. राहु- राहु के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिदिन स्नान के जल में कस्तूरी,गजदन्त,लोबान एवं दूर्वा मिलाकर स्नान करने से लाभ होता है।
9. केतु- केतु के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिदिन स्नान के जल में रक्त चन्दन एवं कुशा मिलाकर स्नान करने से लाभ होता है।

घर बैठे करें विशेष स्नान और पाएं तीर्थस्थानों में स्नान का पुण्यफ़ल- 

यदि आप नित्य घर पर किए जाने वाले स्नान से पुण्यफ़ल की प्राप्ति करना चाहते हैं उसके लिए आपको केवल यह छोटा सा उपाय करना है।

-सर्वप्रथम एक पात्र में नर्मदाजल, गंगाजल या ताजा शुद्धजल ले लें फ़िर उस जल से भरे पात्र को अपने दोनों हाथों में लेकर निम्न मन्त्र का तीन बार उच्चारण कर उस जल को अभिमन्त्रित करें। अभिमन्त्रित करने के उपरान्त उस अभिमन्त्रित जल को अपने स्नान करने वाले जल में मिश्रित कर उस जल से स्नान करें। इस प्रकार के स्नान से आपको समस्त पवित्र नदियों में स्नान का पुण्यफ़ल प्राप्त होगा।
मन्त्र: 
"गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती,
नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेस्मिन सन्निधि कुरु॥"

 

-तुलसी माला धारण कर स्नान करें:

शास्त्रानुसार तुलसी की माला धारण कर स्नान करने से समस्त तीर्थों में स्नान करने का पुण्यफ़ल प्राप्त होता है। 
 

 -ब्रह्म स्नान:

जब भी आप किसी पवित्र नदी, सरोवर या कुण्ड में स्नान करें तो जल में खड़े होकर स्वयं को मध्य में रखते हुए अपने आसपास तर्जनी अंगुली से जल में एक त्रिकोण का निर्माण करें तत्पश्चात् उस त्रिकोण के अन्दर अपने गुरूमन्त्र या भगवन्नाम का उच्चारण करते हुए तीन बार डुबकी लगाएं। इस प्रकार किए गए स्नान को "ब्रह्म स्नान" कहा जाता है।

-ज्योतिर्विदपं. हेमन्त रिछारिया 
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com








गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

ग्रहण का रहस्य


ग्रहण से आप सभी परिचित हैं लेकिन क्या आप ग्रहण को जानते हैं! आज हम ग्रहण से जुड़ी कुछ बद्धमूल धारणाओं की चर्चा करेंगे। ग्रहण से जुड़ी जो सबसे बड़ी धारणा है, वह है "सूतक"। ग्रहण के "सूतक" के नाम पर लोगों का घर से बाहर आना-जाना अवरुद्ध कर दिया जाता है। यहा तक कि सूतक के कारण मन्दिरों के भी पट बन्द कर दिए जाते हैं। ग्रहणकाल में भोजन पकाना एवं भोजन करना वर्जित माना गया है। ग्रहण के मोक्ष अर्थात ग्रहणकाल के समाप्त होते ही स्नान करने की परम्परा है। यहाहम स्पष्ट कर दें कि इन सभी परम्पराओं के पीछे मूल कारण तो वैज्ञानिक है, शेष उस कारण से होने वाले दुष्प्रभावों को रोकने के उद्देश्य से बनाए गए देश-काल-परिस्थित अनुसार लोक नियम। वैज्ञानिक कारण तो स्थिर होते हैं लेकिन देश-काल-परिस्थिति अनुसार बनाए गए नियमों को हमें वर्तमान काल के अनुसार अद्यतन (अपडेट) करना आवश्यक होता है, तभी वे जनसामान्य के द्वारा मान्य होते हैं और उनका अस्तित्व भी बना रह पाता है अन्यथा वे परिवर्तन की भेंट चढ़ ध्वस्त हो जाते हैं। किसी भी नियम को स्थापित करने के पीछे मुख्य रूप से दो बातें प्रभावी होती हैं, पहली-भय और दूसरी-लोभ; लालच। इन दो बातों को विधिवत् प्रचारित कर आप किसी भी नियम को समाज में बड़ी सुगमता से स्थापित कर सकते हैं। धर्म में इन दोनों बातों का समावेश होता है। अत: हमारे समाज के तत्कालीन नीति-निर्धारकों ने वैज्ञानिक कारणों से होने वाले दुष्प्रभावों से जन-सामान्य को बचाने के उद्देश्य से अधिकतर धर्म का सहारा लिया। जिससे यह दुष्प्रभाव आम जन को प्रभावित ना कर सकें किन्तु आज के सूचना और प्रौद्योगिकी वाले युग में जब हम विज्ञान से भलीभाँति परिचित हैं तब इन बातों को समझाने हेतु धर्म का आधार लेकर आसानी से ग्राह्य ना हो सकने वाली बेतुकी दलीलें देना सर्वथा अनुचित सा प्रतीत होता है। आज की युवा पीढ़ी रुढ़बद्ध नियमों को स्वीकार करने में झिझकती है। यही बात ग्रहण से सन्दर्भ में शत-प्रतिशत लागू होती है। आज की पीढ़ी को  "सूतक" के स्थान पर सीधे-सीधे यह बताना अधिक कारगर है कि ग्रहण के दौरान चन्द्र व सूर्य से कुछ ऐसी किरणें उत्सर्जित होती हैं जिनके सम्पर्क में आ जाने से हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और यदि ना चाहते हुए भी इन किरणों से सम्पर्क हो जाए तो स्नान करके इनके दुष्प्रभाव को समाप्त कर देना चाहिए। वर्तमान समय में "ग्रहण" का यही अर्थ अधिक स्वीकार व मान्य प्रतीत होता है।

-ज्योतिर्विदपं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

बुधवार, 31 जनवरी 2018

ज्योतिष और चिकित्सकीय दृष्टिकोण



किसी ज्योतिषी द्वारा जन्मपत्रिका देखने के बाद जब ग्रहशान्ति, जप, दान, रत्न-धारण इत्यादि का परामर्श दिया जाता तब अक्सर लोगों की जिज्ञासा होती है कि इस ग्रहशान्ति कर्म से उन्हें कितने दिनों में लाभ हो जाएगा? साँसारिक दृष्टि से उनका यह प्रश्न उचित भी प्रतीत होता है। ठीक उसी प्रकार जैसे हम बाज़ार में किसी वस्तु को क्रय करने से पूर्व उसकी भलीभाँति जाँच-पड़ताल करने के उपरान्त ही उसे क्रय करते हैं। वहीं अस्वस्थ होने पर जब हम किसी चिकित्सक के पास जाते हैं तब भी हमारे मन में यही प्रश्न होता है कि अमुक दवा से हम कितने दिनों में पुन: स्वस्थ हो जाएँगे! हम उसी चिकित्सक और औषधि को श्रेष्ठ मानते हैं जो हमें तत्काल लाभ देती है। व्यावसायिक एवं साँसारिक दृष्टिकोण से यह सर्वथा उचित मनोभाव है किन्तु जब विषय धर्म, आस्था, ईश्वर और विश्वास सम्बन्धी होता है तब यह मनोभाव अनुचित प्रतीत होता है। हमें धर्म व आस्था के क्षेत्र में व्यावसायिक व चिकित्सकीय दृष्टिकोण नहीं रखना चाहिए। हमारी भावदशा तो एक कृषक की भाँति होनी चाहिए। जिस प्रकार एक कृषक बीजारोपण से पूर्व भूमि तैयार करता है, फ़िर उसमें बीज डालता है, उस बीज की खाद-पानी डालकर उचित देखभाल करता है किन्तु यह सब करने मात्र से ही वह फ़ल या फ़सल प्राप्त करने का अधिकारी नहीं हो जाता है। इन सबके अतिरिक्त वह एक अति- महत्त्वपूर्ण कार्य करता है जो उसके द्वारा बोए गए बीज में अंकुरण का मुख्य कारण बनता है, वह है- प्रार्थना एवं पूर्ण श्रद्धा व धैर्य के साथ प्रतीक्षा। प्रतीक्षा कैसी; धैर्य कैसा!, जो श्रद्धा और विश्वास से परिपूर्ण हो। परमात्मा हमारे दास नहीं हैं जो हमारे द्वारा किए गए पूजा-पाठ, जप-तप, दान के अधीन होकर हमें हमारा अभीष्ट देने के लिए बाध्य हों। परमात्मा तो सदा-सर्वदा बिना किसी कारण के कृपा करते हैं इसीलिए हमारे शास्त्रों में परमात्मा को "अहैतु" कहा गया है। "अहैतु" का अर्थ है बिना किसी हेतु के अर्थात् जो अकारण कृपा करें। अब यक्ष-प्रश्न यह उठता है कि जब परमात्मा बिना किसी कारण के ही कृपा करते हैं तब इन ग्रहशान्तियों, पूजा-पाठ, नामजप, दान इत्यादि से क्या प्रायोजन? इस प्रश्न के समाधान के लिए एक बात समझनी अत्यन्त आवश्यक है कि ईश्वर कृपा तो नि:सन्देह करते हैं लेकिन उस कृपा को हम तक पहुँचाने के लिए एक निमित्त की आवश्यकता उन्हें भी होती है। क्या योगीश्वर भगवान कृष्ण कौरवों की चतुरंगिणी सेना को अपनी भृकुटि-विलास मात्र से परास्त नहीं कर सकते थे? किन्तु उन्होंने अपने इस कार्य के लिए अर्जुन को निमित्त बनाया। सम्पूर्ण गीता का यही सन्देश है- निमित्त हो जाना, साक्षी हो जाना। कर्ताभाव का सर्वथा त्याग कर देना। केवल कुछ कर्मकाण्ड या पूजा-विधानों को सम्पन्न कर देने मात्र से हम शुभफ़ल पाने के अधिकारी नहीं हो जाते। शुभफ़ल प्राप्ति के लिए आवश्यकता होती है सतत शुद्ध मन व निर्दोष चित्त से प्रार्थना करने की। जब हमारी प्रार्थनाएँ ईश्वर तक पहुँचती है तब वे स्वयं हमें सँकेत देते हैं। अब अपने इ्न सँकेतों तो हम तक पहुँचाने के लिए वे किसी ज्योतिषी को निमित्त बनाएँ या फ़िर उस ज्योतिषी के द्वारा बताए गए पूजा-विधानों व ग्रहशान्तियों अथवा वे चाहें तो बिल्कुल तुच्छ और निरर्थक सा प्रतीत होने वाला कोई निमित्त भी चुन सकते हैं यह सब उनकी इच्छा पर निर्भर करता है। हम अपने कुछ वर्षों के अनुभव के आधार पर यह अनुभूत सत्य आप पाठको को बताना चाहेंगे कि यदि शुद्ध मन व निर्दोष भाव से पूजा-विधान एवं प्रार्थनाएँ की जाएँ तो सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते ही हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


रविवार, 23 जुलाई 2017

मन्दिरों की अनोखी परम्पराएँ


श्रीजगन्नाथ मन्दिर पुरी (ओड़ीसा)-
श्रीजगन्नाथ मन्दिर में प्रात:काल भगवान श्री जगन्नाथ को खिचड़ी का बालभोग लगाया जाता है। प्राचीनकाल में एक भक्त कर्माबाई प्रात:काल बिना स्नान किए ही ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बनाती थी। कथानुसार ठाकुर जी स्वयं बालरूप में कर्माबाई की खिचड़ी खाने आते थे लेकिन एक दिन कर्माबाई के यहाँ एक साधु मेहमान हुआ। उसने जब देखा कि कर्माबाई बिना स्नान किए ही खिचड़ी बनाकर ठाकुर जी को भोग लगा देती हैं तो उसने उन्हें ऐसा करने से मना किया और ठाकुर जी का भोग बनाने व अर्पित करने के कुछ विशेष नियम बता दिए। अगले दिन कर्माबाई ने इन नियमों के अनुसार ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बनाई जिससे उन्हें देर हो गई और वे बहुत दु:खी हुई कि आज मेरा ठाकुर भूखा है। ठाकुर जी जब उनकी खिचड़ी खाने आए तभी मन्दिर में दोपहर के भोग का समय हो गया और ठाकुर जी जूठे मुँह ही मन्दिर पहुँच गए। वहाँ पुजारियों ने देखा कि ठाकुर जी मुँह पर खिचड़ी लगी हुई है, तब पूछने पर ठाकुर जी ने सारी कथा उन्हें बताई। जब यह बात साधु को पता चली तो वह बहुत पछताया और उसने कर्माबाई से क्षमायाचना करते हुए उसे पूर्व की तरह बिना स्नान किए ही ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बनाकर ठाकुर जी को खिलाने को कहा। आज भी पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में प्रात:काल बालभोग में खिचड़ी का ही भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि यह कर्माबाई की ही खिचड़ी है। -
जगन्नाथ मन्दिर पुरी (उड़ीसा)- भगवान को बुखार-
ज्येष्ठ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ को ठण्डे जल से स्नान कराया जाता है। इस स्नान के बाद भगवान को ज्वर (बुखार) आ जाता है। १५ दिनों तक भगवान जगन्नाथ को एकान्त एक विशेष कक्ष में रखा जाता है। जहां केवल उनके वैद्य और निजी सेवक ही उनके दर्शन कर सकते हैं। इसे "अनवसर" कहा जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ को फ़लों के रस, औषधि एवं दलिया का भोग लगाया जाता है। भगवान स्वस्थ होने पर अपने भक्तों से मिलने रथ पर सवार होकर निकलते हैं जिसे जगप्रसिद्ध "रथयात्रा" कहा जाता है। "रथयात्रा" प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकलती है।
ब्रज की अनोखी परम्परा-
ब्रज के मन्दिरों में एक अनोखी परम्परा है। जब वहाँ कोई भक्त मन्दिर के विग्रह के लिए माला लेकर जाता है तो वहाँ के पुजारी उस माला को विग्रह से स्पर्श कराकर उसी भक्त के गले में पहना देते हैं। इसके पीछे एक बड़ी प्रीतिकर कथा है। श्रुति अनुसार अकबर के समय की बात है एक वैष्णव भक्त प्रतिदिन श्रीनाथ जी के लिए माला लेकर जाता था। एक दिन अकबर का सेनापति भी ठीक उसी समय माला लेने पहुँचा जबकि माली के पास केवल १ ही माला शेष थी। वैष्णव भक्त और अकबर के सेनापति दोनों ही माला खरीदने के लिए अड़ गए। इस धर्मसंकट से मुक्ति पाने के लिए माली ने कहा कि जो भी अधिक दाम देगा उसी को मैं यह माला दूँगा। दोनों ओर से माला के लिए बोली लगनी आरम्भ हो गई। जब माला की बोली अधिक दाम पर पहुँची तो अकबर के सेनापति बोली बन्द कर दी। अब वैष्णव भक्त को अपनी बोली के अनुसार दाम देने थे। भक्त तो अंकिचन ब्राह्मण था उसके पास इतना धन नहीं था सो उसने उसके घर सहित जो कुछ भी पास था वह सब बेच कर दाम चुकाकर माला खरीद ली। जैसे ही उसने यह माला श्रीनाथजी की गले में डाली वैसे ही उनकी गर्दन झुक गई। श्रीनाथजी को झुके देख उनके सेवा में लगे पुजारी भयभीत हो गए। उनके पूछने पर जब श्रीनाथ जी ने सारी कथा उन्हें बताकर उस भक्त की सहायता करने को कहा। जब पुजारियों ने उस भक्त का घर सहित सब व्यवस्थाएं पूर्ववत की तब जाकर श्रीनाथ जी सीधे हुए। तब से आज तक ब्रज में यह परम्परा है कि भक्त की माला श्रीविग्रह को स्पर्श कराकर उसे ही पहना दी जाती है। किंवदंतियों अनुसार यह घटना गोवर्धन स्थित जतीपुरा मुखारबिन्द की है। ऐसी मान्यता है कि नाथद्वारा में जो श्रीनाथ जी का विग्रह है वह इन्हीं ठाकुर जी का रूप है।
मन्दिरों के रोचक किस्से-
- राजस्थान के डाकौर के रणछोड़दास जी मन्दिर में भगवान को श्रृँगार में आज भी पट्टी बाँधी जाती है। मान्यता है कि यहाँ भगवान ने अपने भक्त को मार से बचाने के लिए उसकी चोटें अपने शरीर पर ले ली थीं।
- उदयपुर के समीप श्रीरूप चतुर्भुजस्वामी के मन्दिर में आज भी वहाँ के राजा का प्रवेश वर्जित है। मान्यता है कि यहाँ भगवान ने अपने भक्त देवाजी पण्डा की अवमानना करने पर राजा को श्राप दे रखा है कि वे उनके मन्दिर में प्रवेश ना करें और ना ही उनके दर्शन करें।
- ओरछा के रामराजा सरकार का मुख्य विग्रह उनके लिए बनाए गए मन्दिर के स्थान पर राजमहल के रसोईघर में स्थित है। कथानुसार यहाँ की महारानी गणेशदेई जब भगवान श्रीराम को अयोध्या लाने गई तो श्रीराम प्रभु ने साथ चलने के लिए अपनी दो शर्ते रखीं, पहली कि वे केवल महारानी की गोद में बैठकर ही यात्रा करेंगे और जहाँ वे उन्हें अपनी गोद से उतारेंगी वे वहीं स्थापित हो जाएँगे। दूसरी शर्त थी कि महारानी केवल पुष्य नक्षत्र में ही यात्रा करेंगी। ओरछा पहुँचने पर महारानी अपनी पहली शर्त भूल गई क्योंकि तब तक मन्दिर अपूर्ण था इसलिए महारानी गणेशदेई ने श्रीराम का विग्रह अपनी गोद से उतारकर महल के रसोईघर में रख दिया। अपनी शर्त के अनुसार भगवान राम महारानी की गोद से उतरते ही वहीं स्थापित हो गए। तब से आज तक यह विग्रह महल के रसोईघर में ही स्थापित है। यद्यपि वर्तमान में उसे मन्दिर का रूप दे दिया गया है।
-उज्जैन स्थित महाकाल व ओरछा स्थित रामराजा सरकार को राजा माना जाता है और राज्य सरकार द्वारा गार्ड आफ़ आनर दिया जाता है।
- हरदा जिले के नेमावर स्थित सिद्धनाथ जी के सिद्धेश्वर मन्दिर का मुख्य द्वार प्रवेश द्वार से उल्टी दिशा में है। मन्दिर प्राँगण में प्रवेश करने पर सर्वप्रथम मन्दिर का पार्श्व भाग दिखाई देता है। मान्यता है कि महाभारत काल में एक विशेष पूजा के चलते प्रात:काल सूर्य की किरणें मन्दिर में प्रवेश ना कर पाएँ इसलिए महाबली भीम ने इस मन्दिर को घुमा दिया था। यह मन्दिर आज तक उसी स्थिति में है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


मंगलवार, 18 जुलाई 2017

श्रीकृष्ण के बालसखा-



भक्तमाल आदि ग्रन्थों में श्रीकृष्ण के बालसखा का वर्णन मिलता है।
श्रीकृष्ण के ब्रजसखा हैं- मधुमंगल, सुबल, सुबाहु, सुभद्र, भद्र, मणिभद्र, वरूथप, तोककृष्ण, भोज, अर्जुन और श्रीदामा।
इन सखाओं में मधुमंगल और श्रीदामा के साथ श्रीकृष्ण की अन्तरंग प्रीति थी। सुदामा भी श्रीकृष्ण के प्रिय सखा थे लेकिन वे गुरूकुल सखा थे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

श्रीराधारानी की सखियाँ


भक्तमाल आदि ग्रन्थों में श्री राधारानी की सखियों का वर्णन मिलता हैं। श्रीराधाकिशोरी जी पांच प्रकार की सखियाँ मानी जाती हैं-
1. सखी - कुसुमिका, विन्ध्या, धनिष्ठा
2. नित्यसखी- कस्तूरी व मणिमंजरिका
3. प्राणसखी - शशिमुखी, वासन्ती, लासिका
4. प्रिय सखी- कुरंगाक्षी, मंजुकेशी, माधवी, मालती
5. परमप्रेष्ठ सखी- श्रीललिता, विशाखा, चित्रा, इन्दुलेखा, चम्पकलता, रंगदेवी, तुंगविद्या व सुदेवी। ये आठ सखी ही "अष्टसखी" के नाम से विख्यात हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया